मेड इन लॉकडाउन : समीक्षा @ शैलेन्द्र तिवारी

मेड इन लॉकडाउन
कठिनाई के समक्ष आशा का वृतांत
कोरोना काल के बाद भारत चिकित्सा के क्षेत्र में नई संभावना के रूप में उभरा है। कोविड-19 के दौरान भारत ने वैक्सीन, वेंटिलेटर, एन-95 मास्क, आरटी-पीसीआर किट से लेकर एमआरआई मशीन तक बनाने और एक विश्व आपूर्तिकर्ता के रूप में अपनी नई पहचान हासिल की है। इस नयी पहचान के कारणभारतीय समाज में आर्थिक और सामाजिक प्रगति के नये मार्ग खुल गए हैं। आधुनिक चिकित्सा अपनी डाइग्नोस्टिक्स के लिए मेडिटेक के बिना अधूरी है। यह अपनी तरह की एक नयी ब्रांच है। जिसमें मेडिकल और टेक्नोलॉजी के साथ आधुनिक विज्ञान का समावेश एवं इनोवेशन भी शामिल है।
प्रगति के इस क्रम में मेडिटेक के क्षेत्र में डॉ. जितेन्द्र शर्मा का नाम उल्लेखनीय है। उन्होंने सन 2018-20 एवं कोविड-19 के दौरान भारत में प्रथम मेडिटेक पार्क बनाकर भारत को विश्व के प्रमुख मेडिटेक निर्माता के रूप में स्थापित कर दिया और उसकी क्षमता विश्व आपूर्तिकर्ता के रूप में विकसित कर भारत को विश्व पटल पर मेडिटेक की प्रथम पंक्ति में खड़ा कर दिया है।
डॉ. शर्मा ने आंध्रप्रदेश के विशाखापट्टनम में कोविड के दौरान 270 एकड की साइट पर रिकार्ड 342 दिनों में 2018-20 में एएमटीजेड (आंध्रप्रदेश) मेडिटेक जोन बनाकर एक विश्व कीर्तिमान रच दिया। एएमटीजेड के एडी एवं संस्थापक सीईओ डॉ. जितेन्द्र शर्मा ने अपनी इस यात्रा को अपनी पुस्तक मेड इन लॉकडाउन में बखूबी बयां किया है, जिसका भावानुवाद वरिष्ठ पत्रकार एवं कवि डॉ. सुधीर सक्सेना ने कठिनाई के साथ आशा के रूप में प्रस्तुत किया है। यह पुस्तक न केवल मेडिटेक प्रौद्योगिकी, अपितु प्रबंधन के भारतीय प्रयत्न का महत्वपूर्ण दस्तावेज बन कर उभरी है।
विश्व पटल पर आईएफएमबीई के क्लीनिकल इंजीनियरिंग डिवीजन के चेयरमेन टॉमजुड ने इस पुस्तक की भूमिका में बताया है कि किस तरह आईएफएमबीई नीतियां और योजनाओं के समन्वयन से यह संभव हो पाया। महामारी कोविड-19 के बाद सारी दुनिया में मृत्यु के भयावह तांडव के बीच डॉ. जितेन्द्र शर्मा और टॉमजुड की मानवीय सोच ने किस तरह इस महान संस्थान को मानवता की सेवा के लिए खड़ा कर दिया। यह कठिनाई के समक्ष आशा का अभूतपूर्व उदाहरण है।
कठिनाई के इस समय में जब विश्व भर में मेडिकल सर्विसेस में चिकित्सा उपकरणों की कमी और इलेक्ट्रानिक और डिजिटल डिवाइसेस, वेंटिलेटरस, वैक्सीन, एन-95 मॉस्क बायोमैटेरियलस दवाओं, पीपीई और आरटीपीसीआर किट और एमआरआई उपकरणों की जरूरत को महामारी से लड़ने के लिए महसूस किया गया। उस समय भारत ने चिकित्सा प्रौद्योगिकी में अपनी जैसे संस्थान अंतर्राष्ट्रीय पहचान एएमटीजेड को बनाकर न केवल एक उत्पादक अपितु अंतर्राष्ट्रीय आपूर्ति के रूप में प्रस्तुत किया।
270 एकड़ में फैले इस विशाल संस्थान एएमटीजेड का निर्माण 2018-20 के दौरान नियत तिथि के पहले ही कर दिया गया। कन्वेंशन सेंटर की आश्चर्यजनक रूप से केवल 78 दिनों में पूरा किया गया। मेउ इन लॉकडाउन एक ऐसी रोमांचक सत्यकथा को भी करता है कि कैसे वैश्विक महामारी के पहले ही सन 2009 में एक स्वास्थ्य प्रौद्योगिकी की परिस्थितिकी तंत्र का तेजी से उदय और विकास हुआ और स्वास्थ्य प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में डब्ल्यूएचओ के मेडिकल डिवाइसेस डिवीजन में मेक्सिको की एक बायोमेडिकल इंजीनियर एड्रियाना वेलासक्वेज लीड भूमिका में आईं। इसके पश्चाम वैश्विक संगठन आईएफएमबीई के क्लीनिकल इंजीनियरिंग डिवीजन और डब्ल्यूएचओ ने मिलकन सन 2020 में एक नया भागीदार “ग्लोबल क्लीनिकल इंजीनियरिंग ऐलाथेंस” के रूप में खड़ा किया। यह सब एक साथ मिलकर 170 देशों में स्वास्थ्य प्रौद्योगिकी प्रबंधन से जुड़े नेताओं के नेटवर्क को संयोजित कर वैश्विक अनुसंधान क्षमता प्रदान करते हैं। डॉ. जितेन्द्र शर्मा बताते हैं कि किस तरह कोविड-19 के दौरान 18 साझा वैज्ञानिक केन्द्रों के माध्यम से उन्होंने किस तरह सहयोग, नवाचार और उत्पादन को अधिकतम करने के लिए भारतीय और अंतर्राष्ट्रीय निर्माताओं को एएमटीजेउ में एक साथ लाने का कठिन कार्य पूरा किया। इस दौरान भारत की ओर अंतर्राष्ट्रीय जरूरतों के अनुसार चिकित्सा उपकरणों पीपीई किट प्रयोगशालाओं, परीक्षणों के उत्पादन के साथ दूसरे देशों की खुली मदद कर पाए।
डॉ. जितेन्द्र शर्मा का घोषित लक्ष्य चिकित्सा प्रौद्योगिकी का लोकतंत्रीकरण है, जिसे उन्होंने 128 देशों के स्वास्थ्य प्रौद्योगिकी सहयोगियों साथ साझा कियका। उनका मानना है कि चिकित्सा उपकरणों की डिजाइन क्षमताओं को ओपन सोर्स प्लेटफार्म पर रखा जाना चाहिये, ताकि नवीन सहायक प्रौद्योगिकियाँ कम लागत में डेवलप की जा सके। इस पुस्तक में एएमटीजेड के कुछ प्रमुख केन्द्रों के बारे में भी बताया गा है, जो कि स्वास्थ्य प्रौद्योगिकी के इस निर्माण में अपनी अभूतपूर्व योदान के कारण महत्वपूर्ण है।
महज तीन वर्षों के भीतर डॉ. जितेन्द्र शर्मा ने एएमटीजेउ जैसे संस्थान को विकसित कर चिकित्सा उपकरण क्षेत्र के विकास, निर्माण नीतिगत समर्थन, वित्तीय सहायता एवं ज्ञान के समायोजन का अभूतपूर्व उदाहरण पेश किया है, जिसके बारे में इस पुस्तक से जाना जा सकता है। एएमटीजेड के साथ ही उन्होंने कलाम इंस्टीटयूट ऑफ हेल्थ टेक्नोलॉजी जैसा सहायक संस्थान भी बनाया है, जहाँ भविष्य के लिए ऐसे संस्थानों की रचना और संचालन के लिए एक बड़ी वर्क फोर्स निर्मितकी जा रही है, जो कि भारतीय युवकों के लिए शिक्षा एवं प्रगति के नये अवसर खोल रही है। निश्चित ही एएमटीजेड ने कठिनाइयों के बीच हमारे लिये आस्था और आर्थिक विकास का नया मार्ग प्रशस्त किया है। “मेउ इन लॉकडाउन” जैसे किताब भारत में हेल्थ केयर के परिदृश्य को समझने और संकल्प और समवेत श्रम से कम अवधि में पिरामिडीय संरचना खड़ी करने की सार्थक सफलता की गौरव-गाथा को जानने के मान से उपयोगी और जरूरी कृति है। इसके लिए लेखक और अनुवादक बधाई के पात्र हैं।
• शैलेन्द्र तिवारी

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