देश में कैंसर की दवाओं का संकट: सिस्प्लैटिन और कार्बोप्लैटिन की कीमत बढ़ाने की तैयारी, मरीजों पर पड़ सकता है असर

कैंसररोधी दवाओं की कमी के बीच सरकार ने कीमत बढ़ाने की प्रक्रिया शुरू की, मरीजों की उपलब्धता को दी प्राथमिकता
नई दिल्ली। देशभर के कई सरकारी और निजी अस्पतालों में पिछले कुछ महीनों से कुछ महत्वपूर्ण कैंसररोधी दवाओं की कमी की शिकायतें सामने आ रही थीं। इस स्थिति को देखते हुए केंद्र सरकार ने इन आवश्यक दवाओं की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए उनकी कीमतों में संशोधन की प्रक्रिया शुरू कर दी है। विशेषज्ञ इसे कैंसर उपचार से जुड़ी दवाओं की आपूर्ति को स्थिर बनाए रखने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मान रहे हैं।
रसायन एवं उर्वरक मंत्रालय के अंतर्गत आने वाले फार्मास्यूटिकल्स विभाग ने 7 जून को राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (NPPA) को पत्र भेजकर संबंधित दवाओं की कीमतों की समीक्षा करने और आवश्यक कार्रवाई करने के निर्देश दिए हैं। इसके लिए सरकार ने ड्रग प्राइस कंट्रोल ऑर्डर (DPCO), 2013 के पैरा-19 में दिए गए विशेष प्रावधान का उपयोग करने की अनुमति प्रदान की है।यह विशेष प्रावधान सरकार को उन परिस्थितियों में हस्तक्षेप करने का अधिकार देता है, जब किसी आवश्यक दवा की उपलब्धता या वहनीयता प्रभावित हो रही हो। इसके तहत सामान्य मूल्य नियंत्रण नियमों से अलग हटकर दवा की कीमतों में संशोधन किया जा सकता है, ताकि मरीजों तक जरूरी दवाओं की निरंतर आपूर्ति बनी रहे।सरकारी दस्तावेजों के अनुसार विभिन्न दवा कंपनियों ने कुल 82 दवा फॉर्मूलेशन की कीमतों में वृद्धि की मांग की थी। इन प्रस्तावों की समीक्षा अंतर-मंत्रालयी समिति (IMC) द्वारा की गई। विस्तृत मूल्यांकन के बाद समिति ने केवल चार फॉर्मूलेशन की कीमतों में वृद्धि की सिफारिश की है। इनमें कार्बोप्लैटिन इंजेक्शन का एक फॉर्मूलेशन, सिस्प्लैटिन इंजेक्शन का एक फॉर्मूलेशन तथा एंटी-टेटनस इम्युनोग्लोब्युलिन के दो फॉर्मूलेशन शामिल हैं। बाकी 78 प्रस्तावों पर अतिरिक्त जानकारी मांगी गई है।
दवा कंपनियों का कहना है कि उत्पादन लागत में लगातार बढ़ोतरी के कारण मौजूदा नियंत्रित कीमतों पर दवाओं का निर्माण करना चुनौतीपूर्ण होता जा रहा है। विशेष रूप से एक्टिव फार्मास्यूटिकल इंग्रीडिएंट (API) की कीमतों में वृद्धि, कच्चे माल की बढ़ती लागत, विनिर्माण खर्च, परिवहन लागत तथा विदेशी मुद्रा विनिमय दरों में उतार-चढ़ाव ने उत्पादन लागत को काफी प्रभावित किया है।देश के प्रमुख कैंसर उपचार केंद्रों में से एक, टाटा मेमोरियल अस्पताल ने भी सिस्प्लैटिन और कार्बोप्लैटिन इंजेक्शन की कमी को लेकर चिंता व्यक्त की थी। अस्पताल ने सरकार को बताया था कि ये दोनों दवाएं कई प्रकार के कैंसर के उपचार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं और इनकी अनुपलब्धता मरीजों के इलाज पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकती है। समिति ने भी अपनी रिपोर्ट में इन दवाओं की निरंतर उपलब्धता को सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण बताया है।फिलहाल इन दवाओं की नई कीमतें निर्धारित नहीं की गई हैं। फार्मास्यूटिकल्स विभाग ने NPPA को कच्चे माल और उत्पादन लागत में हुई वास्तविक वृद्धि का विस्तृत अध्ययन करने के निर्देश दिए हैं। समिति ने सुझाव दिया है कि पिछली मूल्य निर्धारण तिथि से प्रति वर्ष 10 प्रतिशत तक वृद्धि तथा अधिकतम 50 प्रतिशत तक मूल्य संशोधन को आधार माना जा सकता है। हालांकि अंतिम निर्णय लागत संबंधी आंकड़ों के विस्तृत विश्लेषण के बाद ही लिया जाएगा।विशेषज्ञों का मानना है कि कीमतों में सीमित वृद्धि से कैंसर उपचार की कुल लागत में कुछ बढ़ोतरी हो सकती है, लेकिन दवाओं की अनुपलब्धता उससे कहीं अधिक गंभीर चुनौती है।
यदि उत्पादन लागत के दबाव के कारण कंपनियां इन दवाओं का निर्माण कम कर दें या बंद कर दें, तो मरीजों के इलाज में गंभीर बाधाएं उत्पन्न हो सकती हैं। इसी कारण सरकार ने दवाओं की उपलब्धता सुनिश्चित करने को सर्वोच्च प्राथमिकता दी है।स्वास्थ्य क्षेत्र के जानकारों का कहना है कि यदि मूल्य संशोधन के बाद बाजार में आवश्यक दवाओं की आपूर्ति सामान्य बनी रहती है, तो यह कदम कैंसर मरीजों के हित में महत्वपूर्ण साबित हो सकता है। अब देशभर के मरीज, डॉक्टर और अस्पताल NPPA के अंतिम निर्णय का इंतजार कर रहे हैं, जिससे इन आवश्यक दवाओं की उपलब्धता और कीमतों को लेकर स्थिति स्पष्ट हो सके।
