सहस्राब्दी की पहली किरण: डॉ. सुधीर सक्सेना

हमारा सौभाग्य था कि सहस्राब्दी की पहली किरण अपने देश भारत के अंडमान- निकोबार के कचाल में पड़ी। वरिष्ठ पत्रकार डॉ.सुधीर सक्सेना भी इस ऐतिहासिक घटना के साक्षी रहे हैं। उनकी कलम से उस पल को जी लेना नववर्ष पर एक अच्छा अनुभव होगा। संपादक

‘‘आज हमारे यहाँ लोग सूरज देखने आये है’’ उस निकोबारी महिला जिसने रबड़ बागान में मुझसे यह बात कही का चेहरा भी सूर्य की तरह था। तांबई, गोल और खिला हुआ वह पक्की नालियों में बहते पानी में रबड़ की शीटें पछींट रही थी।
सचमुच रोशनी हर जगह फैली हुई थी। सूर्य ने न अपना स्वभाव बदला था, न कृपणता बरती थी, न नाजो-नखरे दिखाए थे और न ही किसी भूखंड, सागर, नदी, पर्वत माला, वन प्रांतर या उपत्यीका को छला था, मगर सृष्टि का विधान ऐसा था कि लोग सूरज देखने कचाल आए थे। बंगाल की खाड़ी में लगभग छोर पर स्थित उस कचाल में जहां बहिरागतों और सैलानियों का प्रवेश वर्जित है। बीती शाम हठात बादल बरस उठे थे। बादलों का बरसना लोगों के मन में संदेह के बादलों
का घनीभूत होना था। आकाश में मेघ शावक स्वच्छंद किलोल कर रहे थे। भय था कि कहीं मेघ खंड सूर्य को छेंक न लें।
नई सहस्राब्दी की पहली किरण के स्वागत के लिए पूरा विश्व आतुर था।
जिज्ञासा, दावे और मतभेद इस बात के थे कि सहस्राब्दी की पहली किरण विश्व के लिये किस सौभाग्यशाली देश के किस हिस्से पर पहले पड़ेगी? बहरहाल, रॉयल ग्रीनविच वेधशाला के खगोलविद् ने सारी शंकाओं का समाधान यह जानकारी देकर कर दिया कि सहस्राब्दी की पहली किरण भारत के अंडमान- निकोबार के कचाल में पडेगी। इसी के साथ यह भी तय हो गया कि नई सहस्राब्दी का बाल सूर्य भारत में उदित होगा। इसी सूचना के फैलाव के साथ नव भास्कर की प्रथम रश्मि के
दर्र्शन के लिए कचाल द्वीप पर जिज्ञासुओं, वैज्ञानिकों और उत्साहियों की भीड़ लग गई।
इसे सहस्राब्दी का सौभाग्य कहें या हम सबका कि मेघों ने धृष्टता नहीं की। सहस्राब्दी से बिना नागा उगने अभ्यस्त रश्मिरथी सूर्य ने अपनी मयार्दा भंग नही की। पौ फटी और प्राची में पहले लालिमा उगी और फिर सूर्य उठा। यह सहस्राब्दी का बाल अरुण था; ललछौंहा, कांतिमय और दीप्तिमान। ऐसे ही बाल सूर्य को कंदुक समझ हनुमान खेलने को मचल उठे थे। एक किवदंती यह भी है कि अंडमान का नामकरण हनुमान से हुआ है। बहरहाल, दृष्टि के फलक में सूर्य का उभरना था कि अय्यप्पा मंदिर के पुजारी कुमार ने शंख फूंक दिया। जलपोत स्वराज द्वीप पर लोगों के हाथ अभ्यर्थना और अवगाहन में जुड़ गए। किसी ने
गायत्री मंत्र का जाप किया तो किसी ने नमन। किसी ने जहाज की रेलिंग पर नारियल फोड़ा तो किसी ने कोई और अनुष्ठान। आज का सूर्य कल के सूर्य से भिन्न नहीं था। इर्दगिर्द सब कुछ वैसा ही था, जैसा बीते कल का था, मगर प्रसंग ऐसा था कि सूर्य के चिरंतन प्रकाश में नयी आभा थी, माहौल में उत्तेजना थी और टापू पर नयी सजधज और नहीं चहल-पहल। भारतीय कालगणना की दृष्टि से यह किसी नये युग का प्रारंभ नहीं था, लेकिन पश्चिमी अवधारणा और ईस्वी सन की गणना का उद्घोष था कि यह नये मिलेनियम का प्रारंभ है। अंडमान-निकोबार द्वीप समूह में स्थित कचाल द्वीप में सूर्य की प्रथम किरण का आगमन ईस्वी सन की तीसरी सहस्राब्दी के शुभारंभ का द्योतक था। लगभग समूचा विश्व उत्फुल्ल था और छोटा-सा कचाल द्वीप मगन। सागर की उत्ताल
तरंगों के कच्छप के पृष्ठ भाग की तरह कचाल द्वीप को उभरे सहस्त्राब्दियों बीत गई, किंतु किसी को स्वप्न में भी गुमान नहीं था कि एक सहस्राब्दी ऐसी भी आएगी, जब भोर की प्रथम रश्मि संपूर्ण भूमंडल में कचाल का नाम रोशन कर देगी। कचाल के जनजीवन को भगवान भुवन भास्कर ने पहले भी आलोकित किया था।
पहले भी यहाँ की वनस्पतियाँ सूर्य की कोमल रश्मियों में नहायी थीं,
किन्तु यह भोर पूर्ववर्ती सहस्रों भोरों से सर्वदा भिन्न थी। जनवरी 2000
ईस्वी की पहली सुबह वह आह्लादकारी सुबह थी जब सूर्य की पहली किरण पृथ्वी पर कहीं अन्यत्र नहीं, वरन इस मधुमय देश में स्थित कचाल पर पड़ी थी। सदियों बीत गई किंतु बीती किसी भी सदी में भोर की पहली किरण को लेकर विश्व में ऐसा विवाद या बखेड़ा नहीं उठा था, जैसा कि ईस्वी सन के 2000 वें वर्ष की पूर्व बेला में। विद्वानों व वैज्ञानिकों को यह तय करना था कि सहस्त्राब्दी की पहली किरण कहां अवतरित होगी? दावेदार कई थे और असमंजस घना था। दावेदारों में सर्वप्रथम दावा था न्यूजीलैंड की राजधानी क्राइस्ट चर्च से करीब 500 मील पूर्व में स्थित चेल्थम टापू को यकीन था कि पिट आइलैंड पर प्रथम किरण के अवतरण का उसका दावा मान लिया जाएगा। चेल्थम के
इस दावे को प्रशांत महासागरीय देश किरीबाटी के दावे ने ग्रहण लगा दिया।
फिर आई टोंगा की बारी। टोंगा ने संयुक्त राष्ट्र संघ से कहा कि सहस्राब्दी का अरुणोदय कहीं और नहीं, बल्कि टोंगा में होगा। विवाद और तूल
पकड़ता, मगर रॉयल ग्रीनविच वेधशाला के वरिष्ठ खगोलविद डॉ. रॉबिन एम. कैचपोल ने गंभीर पड़ताल के बाद घोषणा की कि सहस्राब्दी का बाल सूर्य भारत में अंडमान-निकोबार द्वीपसमूह में स्थित कचाल में उदित होगा।
रॉयल ग्रीनविच वेधशाला की उक्त घोषणा करने की देर थी कि अनजाना अचीन्हा कचाल सुर्खियों में आ गया। कचाल को लेकर लोगों में उत्सुकता उमग उठी। कहाँ है कचाल? निकोबार द्वीपसमूह का समुद्र कच्छपों, घड़ियालों और प्रवालों के लिये जाना जाता है। यहाँ शार्क मछलियां भी होती हैं। कचाल उष्णकटिबंध में 93.30 डिग्री रेखांश तथा 8.00 डिग्री आक्षांश के मध्य पोर्ट ब्लेअर से दक्षिणवर्ती कैंपबेल खाड़ी के रास्ते पर स्थित है। 174 वर्गकिलोमीटर में फैले कचाल की पोर्ट ब्लेअर से दूरी 230 नाटिकल मील हकै। यहाँ पर हर समय मंद समुद्री हवायें चलती रहती हैं। निकोबार द्वीपसमूह में यूँ भी अनेक दुर्लभ किस्म के फूलों और पक्षियों का अस्तित्व है। कचाल में भी ऐसा ही पर्यावरण है। यहाँ नारियल की बहुतायत है। परिवेश इस कदर संवेदनशील है कि यहाँ ज्यादा लोगों को नहीं उतारा जा सकता। कभी तिहन्यू नाम से चर्चित कचाल की जनसंख्या तकरीबन दस हजार है। भारत से लगभग डेढ़ हजार किलोमीटर दूर स्थित कचाल में फकत दो फीसदी लोग ही ऐसे हैं, जिन्होंने मुख्य धरती देखी है, अन्यथा पौने दो सौ वर्ग किलोमीटर का कचाल ही इनकी दुनिया है। भारत से इतनी दूरी के बावजूद भी कचाल मिनी भारत है।
आदिवासी बहुल कचाल में हिंदू, मुस्लिम और ईसाई सभी धर्मावलंबी हैं। यहाँ चर्च है, शिवमंदिर भी और मस्जिद भी। कुछ जगह पूरी की पूरी बस्ती ईसाइयों की है। दसवीं तक पढ़ें अफनी का पूरा परिवार ईसाई है और कुटुम्ब में बीस से भी ज्यादा लोग हैं। कचालवासियों के घर अद्भुत होते हैं। वे जमीन मेंvलठ्ठे गाड़कर उन पर लट्ठों, फट्टों और तख्तों से घर बनाते हैं। लट्ठों पर इसलिए ताकि वे समुद्री लहरों से सुरक्षित रहे। निकोबारी घरों, स्वाभाविक तौर पर कचाल में भी, सूअरों, मुर्गियों और बकरियों के लिए अलग से बाड़े देखने को मिले। कचाल में वृक्षों की हरीतिमा आँखों को रुचती है और समुद्र का हरा-नीला विस्तार विस्मयकारी सुखद अनुभूति से भर देता है। समुद्र को देर तक निहारना ऐसा अदभुत सुख है, जिसे शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता है। सहस्राब्दी के प्रथम अरुणोदय का चाक्षुष अनुभव जितना यादगार है,
उतनी ही यादगार है ‘स्वराज द्वीप’ नामक जलपोत पर की गयी सागर यात्रा। कलकत्ता से पोर्ट ब्लेयर की 1255 किलोमीटर की हवाई यात्रा के पश्चात पोर्ट ब्लेयर से कचाल की यात्रा हमने जलपोत में की। 157 मीटर लंबा और 21 मीटर चौड़ा 4701 टन का स्वराज पोत विशाखा पट्टनम में तैयार होकर पहली सामुद्रिक यात्रा पर निकला था। कह सकते हैं कि स्वराज पोत का जलावतरण ही सहस्राब्दी के सूर्योदय की अगवानी के प्रयोजन से हुआ था। कचाल में बाल अरुण देखकर हम जब कचाल से रवाना हुये तो सूरज डूबा नहीं था। सूरज हमारे साथ था। सहस्राब्दी के प्रथम अरुणोदय की स्मृति में कचाल में सूर्य स्तंभ का शिलान्यास उल्लेखनीय घटना है। तीसरी सहस्राब्दी के प्रथम अरुणोदय के इस पक्ष को कौन बिसरा सकता है कि सूर्य की पहली किरण वसुन्धरा
पर, कहीं और नहीं, कचाल पर पड़ी। घड़ी के कांटे तब भोर में पांच बजकर 28
मिनट पर थे। कुछ घटनायें ऐसी होती हैं, जो घटने के बाद स्मृति के घट में
सुरक्षित रहती हैं। कह सकते हैं कि एक जनवरी को सांझ सूरज डूबकर भी नहीं
डूबा। उस दिन रश्मिरथी स्मृतिपटल पर सदैव के लिये अंकित हो गया। इस
अरुणोदय से बरसों पहले कविवर जयशंकर प्रसाद ने लिखा था- अरुण यह मधुमय
देश हमारा। ईसा की तीसरी सहस्राब्दी के सूर्योदय ने कविता की इस पंक्ति
के साथ-साथ कविता की समय के पार देखने की शक्ति को भी आलोकित कर दिया। कह
सकते है कि कचाल में उगा सूर्य कभी डूबेगा नहीं। घड़ी में कांटे सरकते
रहेंगे और दिनभर का थकामांदा सूर्य अपनी थकान मिटा हर सुबह हमारे साथ
होगा, खूबसूरत, लाल और तरोताजा।

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