सीएसईबी की जुगाड़तंत्र व्यवस्था बेनकाबः राख रोकने लिया जा रहा ग्रीन नेट का सहारा

कोरबा 21 अपै्रल। छत्तीसगढ़ के पावर हब में इन दिनों एक अनोखी “टेक्नोलॉजी” चर्चा में है। कागजों में आधुनिक और जमीनी हकीकत में जुगाड़ साबित हो रही इस व्यवस्था के तहत सीएसईबी के अफसर राख को रोकने के लिए ग्रीन नेट का सहारा ले रहे हैं।

झाबू राखड़ और डिंडोल भांठा में लगाए गए ये नेट हवा में उड़ती राख को थामने के बजाय खुद ही हवा के आगे हथियार डालते नजर आ रहे हैं। दावा था कि ग्रीन नेट से राख के प्रदूषण पर लगाम लगेगी, लेकिन हकीकत में ये नेट कुछ दिनों की मेहमान साबित हो रहे हैं। तेज हवा आते ही नेट फटते हैं, गिरते हैं और फिर वही राख खुले आसमान में उड़कर आसपास के गांवों और बस्तियों को अपनी चपेट में ले लेती है। सवाल सीधा है, जब समस्या भारी है तो समाधान इतना हल्का क्यों? क्या ये सिर्फ दिखावे की कवायद है या जिम्मेदारी से बचने का आसान रास्ता?

स्थानीय लोगों का कहना है कि राख की धूल अब रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन चुकी है। सांस लेना मुश्किल, घरों में परत दर परत धूल, और ऊपर से ये अस्थायी इंतजाम। ऐसे में “ग्रीन नेट” पर्यावरण सुरक्षा से ज्यादा एक औपचारिकता नजर आता है। तकनीक के नाम पर जुगाड़ और जमीनी हकीकत से दूरी, यही तस्वीर सामने आ रही है। बड़ा सवाल यह है कि आखिर कब तक सिस्टम इसी तरह के अस्थायी उपायों से अपनी जिम्मेदारी निभाने का दावा करता रहेगा? कोरबा में राख उड़ रही है, लेकिन जवाबदेही अब भी जमीन पर नहीं उतर रही।

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