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Jitiya Vrat: पितृपक्ष की अष्टमी तिथि पर रखा जाने वाला जीवित्पुत्रिका या जितिया व्रत संतान की लंबी उम्र और सुख-समृद्धि की कामना से जुड़ा माना जाता है। धार्मिक परंपरा के अनुसार इस दिन व्रत रखने वाली महिलाएं को जीमूतवाहन की कथा के साथ चिल्हो और सियारन की कहानी जरूर सुननी चाहिए। इस साल जितिया व्रत 3 अक्टूबर को मनाया जा रहा है। कथा में त्याग, वचन और व्रत के नियमों के महत्व को बताया गया है।

जीमूतवाहन ने बचाई मां की संतान

पौराणिक कथा के अनुसार नैमिषारण्य में ऋषियों ने सूत जी से पूछा कि कलियुग में ऐसा कौन सा व्रत है, जिससे संतान को दीर्घायु का आशीर्वाद मिल सके। इसके जवाब में उन्होंने जीमूतवाहन से जुड़ा प्रसंग सुनाया।

कथा के अनुसार जीमूतवाहन सत्यवादी और दयालु राजा थे। एक बार वह अपनी पत्नी के साथ उसके मायके गए थे। उसी दौरान रात में उन्हें एक महिला के रोने की आवाज सुनाई दी। पूछने पर पता चला कि एक गरुड़ रोज नागवंश के एक बालक को अपना भोजन बनाता है और उस दिन उस महिला के पुत्र की बारी थी।

मां का दुख देखकर जीमूतवाहन ने उसके बेटे की जगह खुद जाने का फैसला किया। वह गरुड़ के सामने पहुंच गए। गरुड़ ने जब राजा का साहस और त्याग देखा तो उनकी पहचान पूछी। जीमूतवाहन ने अपना परिचय दिया और बदले में ऐसा वर मांगा जिससे पहले गरुड़ के कारण मारे गए जीव भी जीवन पा सकें और आगे किसी बालक को अपना शिकार न बनना पड़े।

गरुड़ ने दिया जितिया व्रत का वरदान

राजा के त्याग से प्रसन्न होकर गरुड़ ने उनकी इच्छा पूरी की। कथा के अनुसार उन्होंने अमृत लाकर मृत नागों को जीवन प्रदान किया और भविष्य में बच्चों को न खाने का वचन दिया। इसके बाद उन्होंने वरदान दिया कि अश्विन मास की अष्टमी तिथि पर जीवित्पुत्रिका व्रत करने वाली महिलाओं की संतान को दीर्घायु का आशीर्वाद मिलेगा।

चिल्हो और सियारन की अधूरी-अधूरी कथा

कथा आगे चिल्हो और सियारन तक पहुंचती है। दोनों ने व्रत की कथा सुनी और व्रत करने का संकल्प लिया। चिल्हो ने नियमों का पालन करते हुए व्रत पूरा किया, लेकिन सियारन से व्रत के नियम पूरे नहीं हो सके। कथा में बताया गया है कि बाद में दोनों ने मनुष्य रूप में जन्म लिया।

पूर्व जन्म के कर्मों के अनुसार चिल्हो के रूप में जन्मी महिला के आठ पुत्र हुए और सभी जीवित रहे, जबकि सियारन के रूप में जन्मी महिला की संतान बार-बार मृत्यु को प्राप्त होती रही। वह अपनी बहन के बच्चों को देखकर परेशान रहने लगी।

व्रत के महत्व को समझकर बदली जिंदगी

आखिरकार दोनों के पिछले जन्म का रहस्य सामने आया। चिल्हो ने बताया कि उसने जीवित्पुत्रिका व्रत पूरी श्रद्धा और नियमों के साथ किया था, जबकि सियारन ने व्रत बीच में ही छोड़ दिया था। इसके बाद सियारन ने दोबारा विधिपूर्वक व्रत किया और कथा के अनुसार उसे भी पुत्र प्राप्त हुए, जो आगे चलकर दीर्घायु हुए।

धार्मिक मान्यता में यह कथा जितिया व्रत के नियम, संकल्प और श्रद्धा के महत्व को दर्शाती है। इसी वजह से व्रत के दिन महिलाएं जीमूतवाहन, चिल्हो और सियारन की कथा सुनती हैं और संतान के सुखी, स्वस्थ और दीर्घ जीवन की कामना करती हैं।

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