IMG-20261020-WA0015
R.O. No. 13952/23
R.O. No. 13952/23

जगदलपुर। बस्तर की ऐतिहासिक पहचान और आदिवासी समाज की सांस्कृतिक अस्मिता से जुड़े मुरिया दरबार को लेकर उठे विवाद के बीच आधिकारिक कार्यक्रम सूची ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। बस्तर दशहरा पर्व-2026 के आधिकारिक न्योते में ‘मुरिया दरबार’ का नाम स्पष्ट रूप से दर्ज है। कार्यक्रम के मुताबिक, 23 अक्टूबर को दोपहर 2 बजे सिरहासार भवन में पारंपरिक मुरिया दरबार आयोजित होगा। दूसरी ओर, बस्तर दशहरा समिति और प्रशासन ने नाम बदलने की चर्चाओं को निराधार बताया है।

ऐसे में सवाल उठता है कि जब आधिकारिक कार्यक्रम में मुरिया दरबार का नाम बरकरार है, तो नाम बदलने का विवाद आखिर किस आधार पर शुरू हुआ? क्या किसी प्रारंभिक पर्चे में गलती हुई थी, या किसी अन्य दस्तावेज को लेकर यह चर्चा फैली? इन सवालों का जवाब मूल दस्तावेज सामने आने के बाद ही स्पष्ट हो सकेगा।

मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के नेतृत्व में बस्तर की परंपरा पर नजर

छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णु देव साय स्वयं आदिवासी समाज से आते हैं। ऐसे में बस्तर की ऐतिहासिक परंपराओं, जनजातीय संस्कृति और सामाजिक व्यवस्था से जुड़े आयोजनों का महत्व और बढ़ जाता है। मुरिया दरबार केवल एक औपचारिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि बस्तर की पारंपरिक जनसंवाद व्यवस्था का प्रतीक माना जाता है।

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु की प्रस्तावित सहभागिता के कारण इस वर्ष बस्तर दशहरा का यह आयोजन राष्ट्रीय स्तर पर भी विशेष ध्यान आकर्षित कर रहा है। ऐसे अवसर पर मुरिया दरबार की पहचान और आयोजन से जुड़ी जानकारी का प्रमाणिक होना आवश्यक है। सरकार और प्रशासन की जिम्मेदारी है कि बस्तर की सांस्कृतिक विरासत से संबंधित सूचनाएं स्पष्ट रूप से जनता तक पहुंचें।

600 साल से अधिक पुरानी परंपरा, मुरिया दरबार का ऐतिहासिक महत्व

बस्तर दशहरा लगभग छह शताब्दियों पुरानी परंपरा माना जाता है। देश के अन्य हिस्सों में जहां दशहरा रावण दहन से जुड़ा है, वहीं बस्तर में यह पर्व मां दंतेश्वरी की आराधना और स्थानीय देवी-देवताओं की परंपराओं पर केंद्रित है।

मुरिया दरबार इस उत्सव का महत्वपूर्ण हिस्सा है। ऐतिहासिक रूप से इसे जनता की समस्याओं को सामने रखने और पारंपरिक प्रतिनिधियों के माध्यम से संवाद करने वाली व्यवस्था के रूप में जाना जाता है। इसमें मांझी, चालकी, जनप्रतिनिधि और अन्य पारंपरिक प्रतिनिधियों की भूमिका महत्वपूर्ण रहती है।

बस्तर की इस विशिष्ट परंपरा के बारे में अधिक जानकारी के लिए पढ़ें:

– “बस्तर जिला प्रशासन: संस्कृति एवं विरासत” (https://bastar.gov.in/en/tourism/culture-heritage/)
– “भारत सरकार का पर्यटन पोर्टल: बस्तर दशहरा” (https://www.incredibleindia.gov.in/en/festivals-and-events/chhattisgarh/bastar-dussehra)
– “सहापीडिया: बस्तर दशहरा का ऐतिहासिक विवरण” (https://www.sahapedia.org/basatara-kaa-aitaihaasaika-dasaharaa-parava-basatara-dasaharaa)

विक्रम मंडावी के विरोध के बीच कांग्रेस से भी मांगा जा रहा जवाब

मुरिया दरबार के नाम को लेकर कांग्रेस विधायक विक्रम मंडावी की ओर से विरोध और नाम बहाल करने की मांग किए जाने की खबरें सामने आई हैं। विपक्ष को सरकार से सवाल पूछने और आदिवासी समाज की अस्मिता से जुड़े मुद्दे उठाने का अधिकार है, लेकिन किसी भी दावे का आधार प्रमाणिक दस्तावेज होना चाहिए।

उपलब्ध आधिकारिक कार्यक्रम सूची में ‘मुरिया दरबार’ ही दर्ज है। प्रशासन ने भी नाम बदलने की चर्चाओं को निराधार बताया है। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि नाम परिवर्तन का दावा किस दस्तावेज के आधार पर किया गया था।

आदिवासी अस्मिता पर राजनीति नहीं, तथ्यों से हो फैसला

मुरिया दरबार बस्तर की साझा सांस्कृतिक विरासत है। इस विषय पर सवाल उठाना गलत नहीं, लेकिन अपुष्ट जानकारी को अंतिम सच मान लेना उचित नहीं होगा। सोशल मीडिया पर किसी पर्चे, तस्वीर या बयान को साझा करने से पहले उसकी प्रमाणिकता जांचना जरूरी है।

कांग्रेस हो या सत्तापक्ष—सभी राजनीतिक दलों की जिम्मेदारी है कि आदिवासी समाज की आस्था और परंपराओं से जुड़े विषयों पर प्रमाणों के आधार पर बात करें।

23 अक्टूबर को सिरहासार भवन में होगा मुरिया दरबार

बस्तर दशहरा पर्व-2026 की उपलब्ध आधिकारिक कार्यक्रम सूची के अनुसार, 23 अक्टूबर को दोपहर 2 बजे सिरहासार भवन में मुरिया दरबार आयोजित होगा। कार्यक्रम में सांसद, विधायक, पुजारी, मांझी और अन्य पारंपरिक सेवादारियों की सहभागिता का उल्लेख है।

फिलहाल उपलब्ध दस्तावेजों में मुरिया दरबार का पारंपरिक नाम बरकरार है और प्रशासन भी नाम बदलने की चर्चा को निराधार बता चुका है। इसलिए विवाद पर अंतिम निष्कर्ष निकालने से पहले कथित ‘आम दरबार’ वाले दस्तावेज की प्रमाणिकता सामने आना जरूरी है।

बस्तर की परंपरा किसी राजनीतिक दल की नहीं, पूरे समाज की धरोहर है। मुरिया दरबार पर उठे सवालों का जवाब आरोप-प्रत्यारोप से नहीं, बल्कि आधिकारिक दस्तावेजों और तथ्यों से मिलना चाहिए।

Spread the word