कोरबा। स्वास्थ्य विभाग में सरकारी पैसे का हिसाब-किताब जितना खंगालिए, उतनी ही नई कहानी बाहर आती नजर आ रही है। पिछले करीब चार वर्षों से कोरबा में पदस्थ मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. सूर्यनारायण केशरी एक बार फिर सवालों के घेरे में हैं। इस बार मामला रेडक्रॉस सोसायटी के फंड से हुए लाखों रुपये के भुगतान और कथित तौर पर टुकड़ों में बिल लगाकर खरीद प्रक्रिया से बचने से जुड़ा है।
आरटीआई के तहत मिले दस्तावेजों की पड़ताल में ऐसे भुगतान सामने आए हैं, जिन्होंने विभाग की वित्तीय कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। मामला ऐसा है कि सरकारी फाइलों में बिल तो दौड़ते दिखाई दे रहे हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर उस काम या सामग्री की जानकारी तलाशने पर तस्वीर कुछ और ही नजर आती है।
बिल छोटे, रकम बड़ी… और सवाल उससे भी बड़ा !
दस्तावेजों के अनुसार एक ही फर्म को करीब 1 लाख 20 हजार रुपये के तीन भुगतान महज दो महीने के भीतर किए गए। विभागीय लिपिक से जब इस फर्म के भुगतान का आधार पूछा गया तो बताया गया कि फर्म द्वारा राशन सामग्री उपलब्ध कराई गई थी।
अब सवाल यह है कि आखिर यह कौन सा राशन था, जिसकी खरीद हुई, लेकिन विभाग के अधिकांश लोगों को उसकी भनक तक नहीं लगी ?
हमारी टीम ने सीएमएचओ कार्यालय में पदस्थ करीब 10 अधिकारी-कर्मचारियों से फोन पर जानकारी लेकर उक्त फर्म और कथित आपूर्ति की तस्दीक करने का प्रयास किया। हैरानी की बात यह रही कि किसी ने भी न तो इस फर्म को पहचानने की बात कही और न ही संबंधित कार्य या आपूर्ति के बारे में कोई जानकारी होने की पुष्टि की।
यानी फाइल में राशन आया, बिल लगा, भुगतान हुआ… लेकिन विभाग के लोगों को इसकी खबर ही नहीं !
अब इसे संयोग मानें या सिस्टम का कमाल, यह जांच का विषय है।
तीन बिलों का खेल या अलग-अलग खरीद ?
यहां सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि सामग्री वास्तव में अलग-अलग समय पर खरीदी गई थी तो उसके दस्तावेज, स्टॉक रजिस्टर, प्राप्ति प्रमाणक, वितरण रिकॉर्ड और संबंधित मांग-पत्र कहां हैं ?
और यदि खरीद एक ही प्रकृति की थी तो उसे अलग-अलग बिलों में क्यों बांटा गया ?
आरटीआई दस्तावेजों में सामने आए भुगतान का पैटर्न इस सवाल को और मजबूत करता है कि कहीं छोटे-छोटे भुगतान के जरिए ऐसी खरीद को टेंडर अथवा निर्धारित प्रक्रिया के दायरे से बाहर रखने की कोशिश तो नहीं की गई।
तीन लाख की सीमा के आसपास घूमते बिल !
मामले का सबसे दिलचस्प पहलू भुगतान की राशि है। आरोप है कि अलग-अलग बिल इस तरह प्रस्तुत किए गए कि प्रत्येक भुगतान निर्धारित सीमा के भीतर रहे। यदि किसी एक ही कार्य या खरीद की कुल लागत लाखों रुपये है, तो उसे छोटे-छोटे हिस्सों में बांटकर भुगतान कराने की जरूरत आखिर क्यों पड़ी ?
क्या यह सिर्फ कागजी सुविधा थी या फिर टेंडर प्रक्रिया से बचने की कोई तरकीब ?
इसका जवाब दस्तावेजों की विस्तृत जांच से ही सामने आएगा। लेकिन सवाल उठना इसलिए स्वाभाविक है क्योंकि सरकारी खरीद में रकम की सीमा और प्रक्रिया का सीधा संबंध होता है।
रेडक्रॉस के पैसे से किसका फायदा ?
मामले का सबसे गंभीर पहलू यह है कि भुगतान रेडक्रॉस सोसायटी के फंड से किया गया बताया जा रहा है। रेडक्रॉस जैसी संस्था के पैसे का इस्तेमाल किस नियम और किस स्वीकृति के आधार पर किया गया, यह अपने आप में जांच का विषय है।
किस अधिकारी ने भुगतान स्वीकृत किया ? फर्म का चयन कैसे हुआ ? क्या बाजार से दरें मंगाई गईं ? क्या दूसरी फर्मों से प्रतिस्पर्धी दर ली गई ? सामग्री की वास्तविक आपूर्ति हुई तो उसका स्टॉक कहां दर्ज है ? और यदि राशन आया था तो उसका वितरण किसे किया गया ?
इन सवालों का जवाब शायद उन फाइलों में छिपा है, जिन्हें अभी पूरी तरह खंगाला जाना बाकी है।
अभी तो दवाइयों की फाइल बाकी है !
मामला केवल राशन सामग्री तक सीमित दिखाई नहीं दे रहा। विभाग में दवाइयों की खरीदी से जुड़े दस्तावेज भी सामने आने की प्रक्रिया में हैं, जिनमें प्रारंभिक तौर पर खरीद प्रक्रिया को लेकर अनियमितताओं के संकेत मिलने की बात सामने आ रही है।
यदि इन दस्तावेजों में भी इसी तरह के भुगतान पैटर्न सामने आते हैं, तो रेडक्रॉस फंड से लेकर दवा खरीदी तक पूरा मामला जांच के दायरे में आ सकता है।
विभाग में ‘कट’ की चर्चा, बंगले की कहानी भी !
विभागीय हलकों में एक और चर्चा लगातार सुनाई दे रही है। नाम न छापने की शर्त पर कुछ लोगों का कहना है कि स्वास्थ्य विभाग में कथित ‘कट’ की चर्चा सबसे ज्यादा होती है। हालांकि इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है, इसलिए इन्हें फिलहाल आरोप और चर्चा के तौर पर ही देखा जाना चाहिए।
इसी तरह विभागीय स्तर पर यह चर्चा भी है कि साहब के कार्यकाल में उनके दो मातहतों ने कथित तौर पर करोड़ों की संपत्ति खड़ी कर ली है। यह संपत्ति किस आय से बनी, इसका सरकारी पद से कोई संबंध है या नहीं और इसमें किसी अधिकारी की भूमिका है या नहीं — इसका जवाब जांच एजेंसियां ही दे सकती हैं।
क्योंकि धुआं दिख रहा है तो आग है, यह पत्रकारिता का निष्कर्ष नहीं हो सकता… लेकिन धुआं उठने की वजह तलाशना जरूर पत्रकारिता का काम है।
अब जवाब फाइलों से चाहिए
इस पूरे मामले में सीएमएचओ कार्यालय की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण है। भुगतान किसने स्वीकृत किया ? फर्म का चयन किस आधार पर हुआ ? सामग्री वास्तव में खरीदी गई या नहीं ? स्टॉक रजिस्टर में उसकी एंट्री है या नहीं ? और सबसे अहम — क्या एक ही प्रकृति के कार्यों को छोटे-छोटे बिलों में बांटकर भुगतान किया गया ?
इन सवालों के जवाब मिलने के बाद ही तस्वीर पूरी तरह साफ होगी।
फिलहाल आरटीआई से सामने आए दस्तावेजों ने स्वास्थ्य विभाग की वित्तीय व्यवस्था पर बड़ा सवालिया निशान जरूर लगा दिया है।
सरकारी खजाना कोई ऐसी अलमारी नहीं है जिसकी चाबी किसी एक के हाथ में हो और जब चाहा, जितना चाहा, बिल लगाकर निकाल लिया।
अब देखना यह है कि इन दस्तावेजों के सामने आने के बाद विभाग जांच की तरफ बढ़ता है या फिर फाइलों पर एक और कवर चढ़ाकर मामला ठंडे बस्ते में डाल दिया जाता है।
कहानी अभी खत्म नहीं हुई है… दवा खरीदी के दस्तावेज सामने आने बाकी हैं।
सीरीज जारी है…

