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R.O. No. 13952/23
R.O. No. 13952/23

रायपुर/दंतेवाड़ा   एक तरफ शिक्षा विभाग शाला त्यागी बच्चों को मुख्यधारा से जोड़ने के लिए अभियान चल रहा है। दूसरी ओर, दंतेवाड़ा जिले के समेली में इच्छुक विद्यार्थियों को प्रवेश देने के बजाय स्कूल से लौटाने का मामला सामने आया है। समेली में लगभग 1.30 करोड़ रुपए की लागत से हाईस्कूल भवन बनाया गया। लाखों रुपए के टेबल-कुर्सी, फर्नीचर और कंप्यूटर खरीदे गए।

हैरान कर देने वाली हकीकत यह है कि इस स्कूल में पढ़ने वाले विद्यार्थियों की कुल दर्ज संख्या महज 3 है। वे तीनों भी कभी स्कूल नहीं आते। इसके बावजूद यह स्कूल रोजाना कागजों और दफ्तरों में नियमित रूप से संचालित हो रहा है।

स्कूल में 1 प्राचार्य, 4 नियमित वरिष्ठ शिक्षक और 3 अतिथि शिक्षकों समेत कुल 8 लोगों की पदस्थापना है। इनके वेतन के लिए आहरण-संवितरण अधिकारी हर महीने करीब 6 लाख रुपए सरकारी खजाने से निकाल रहे हैं। यानी सालभर में लगभग 72 लाख रुपए की राशि ऐसे स्कूल पर खर्च हो रही है, जहां कक्षाओं में सिर्फ सन्नाटा पसरा रहता है।

शिक्षा विभाग से मिली जानकारी के मुताबिक, स्कूल के नियमित प्राचार्य का मासिक वेतन 80 हजार रुपए है। चार वरिष्ठ शिक्षकों में प्रत्येक का वेतन लगभग 1 लाख है। कुल 4 लाख रुपए। 3 अतिथि शिक्षकों का मानदेय 90 हजार रुपए प्रति माह है। शिक्षा विभाग की योजना के मुताबिक यह हाईस्कूल आसपास के 5 संकुल केंद्रों के विद्यार्थियों को कवर करने के लिए बनाया गया था

 

नियमों के तहत स्कूल को सीधे बंद नहीं किया जा सकता। स्कूल को दूसरे स्थान पर शिफ्ट करने की फाइल प्रक्रियाधीन है। रजिस्टर में 3 बच्चे दर्ज हैं। 6 बच्चों को प्रवेश न देने या लौटाने के मामले की जानकारी मुझे नहीं है। -प्रमोद ठाकुर, डीईओ, दंतेवाड़ा

 

इस सत्र में 6 बच्चों को एडमिशन देने से स्कूल ने किया था इनकार

 

समेली हाईस्कूल के उपस्थिति रजिस्टर में कक्षा 9वीं में 1 और 10वीं में 2 विद्यार्थी दर्ज हैं। इनके लिए 10 लाख रुपए से अधिक का फर्नीचर और 20 लाख रुपए से अधिक के कंप्यूटर उपकरण खरीदे गए हैं। सत्र 2026-27 की शुरुआत में समेली और आसपास के गांवों के 6 ऐसे विद्यार्थी, जो पूर्व परीक्षा में अनुत्तीर्ण होने के बाद दोबारा पढ़ना चाहते थे, दाखिला लेने पहुंचे थे।

स्कूल प्रबंधन ने उन्हें प्रवेश दिए बिना ही लौटा दिया। अभी स्थिति यह है कि स्थानीय स्तर पर हाईस्कूल होने के बावजूद इलाके के 50 से ज्यादा छात्र-छात्राएं रोजाना 9वीं-10वीं की पढ़ाई के लिए कुआकोंडा, पालनार, किरंदुल जैसी अन्य जगहों पर जाने को मजबूर हैं।

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