अंगूठा लगाने वाले अनेक हितग्राही राशन से वंचित, 38 क्विंटल चावल का हुआ घोटाला

कोरबा 28 फरवरी। आम लोगों को किफायती दर पर राशन, चना और शक्कर उपलब्ध करने के लिए सरकार के द्वारा सार्वजनिक वितरण प्रणाली पर काम किया जा रहा है। कोरबा शहरी क्षेत्र में इस योजना को कुछ संचालकों ने मजाक बना कर रखा है। महाराणा प्रताप नगर के अटल आवास क्षेत्र में संचालित पीडीएस दुकान से वास्ता रखने वाले को पिछले और मौजूदा महीने का राशन नहीं मिल सका है जबकि उन्होंने अपने अंगूठे का निशान लगा दिया है। खबर है कि 38 क्विंटल राशन को कथित रूप से हजम कर दिया गया है।

महाराणा प्रताप नगर वार्ड के अंतर्गत लोगों को सुविधाएं देने के लिए बीते वर्षों में सार्वजनिक उचित मूल्य की दुकानों का विकेंद्रीकरण किया गया। इसके अंतर्गत हितग्राहियों को अलग-अलग क्षेत्र में विभाजित किया गया ताकि उन्हें आसानी से सुविधा प्राप्त हो। सूत्रों के अनुसार अटल आवास क्षेत्र में औपचारिक रूप से चलाई जा रही दुकान का संचालन पेपर में महिलाएं कर रही है लेकिन इसका वास्तविक संचालन भारत अल्युमिनियम कंपनी लिमिटेड में काम करने वाला निलेन्द्र कुमार कर रहा है। पिछले कई महीनो से लगातार हितग्राहियों के द्वारा यहां को लेकर शिकायत की जा रही है कि दुकान समय पर नहीं खुलता है। इसके बंद होने का भी कोई समय नहीं है और ना हफ्ते के दिन तय है। इस मनमाने रवैया के चलते हितग्राहियों को अपना कीमती समय राशन पाने के लिए जाया करना पड़ता है।
जानकार सूत्रों ने बताया कि नागरिक आपूर्ति निगम के द्वारा उपभोक्ताओं को वितरित करने के लिए पिछले महीने दिए गए राशन की कुल मात्रा में से 38 क्विंटल को ब्लैक मार्केट में खपा दिया गया। बड़ी संख्या में हितग्राहियों को इसका वितरण किया जाना था। हैरान करने वाली बात यह है कि ऐसे हितग्राहियों ने यह सोचकर अपने थम्ब सोसाइटी के इक्विपमेंट में लगा दिए की जल्द ही उन्हें राशन मिल जाएगा। लेकिन लोगों का यह सोचना गलत साबित हुआ। बताया गया कि राशन पानी के लिए लोग लगातार चक्कर लगा रहे हैं लेकिन उन्हें संतोषजनक जवाब नहीं मिल पा रहा है। पीडीएस समिति इस बारे में बोल पाने की स्थिति में नहीं है क्योंकि उसने अधिकार दूसरे को दे रखा है।

जानकारी मिली है कि शहरी और ग्रामीण क्षेत्र में संचालित सरकारी मूल्य की दुकानों में झोलझाल की समस्या लंबे समय से है। सिस्टम में कई बदलाव करने के बाद भी गड़बडिया हो रही है। अनेक संचालकों ने अपने तरीके से व्यवस्था चलाने तोड़ निकाल लिया है। बताया जाता है कि लगातार कई प्रकार की शिकायतें पीडीएस दुकानों को लेकर उपभोक्ता करते हैं लेकिन कार्यवाही नहीं होती। वजह बतायी जाती है कि दुकानों की क्षमता के हिसाब से संचालकों ने खाद्य विभाग को हर महिने निश्चित कमीशन देना तय किया है। यह बड़ी राशि होती है। इस नजराना की प्राप्ति से विभाग के अधिकारी शिकायतों पर ध्यान नहीं देते और एक तरीके से संचालकों को अभयदान देते हैं।

लोगों को बहुत सारे मामले में यह शिकायत भी काफी समय से बनी है कि महिने के अंतिम दिनों में पीडीएस संचालक लंबा खेल करते हैं इसमें एपीएल कोटे सहित कुछ मामलों में बीपीएल का चावल पार हो जाता है। इसके पीछे सोची समझी चाल शामिल रहते हैं। बताया गया कि प्रशासन ने पारदर्शिता के खोखले दावे करते हुए लोगों को विकल्प देने की कोशिश की है कि वे स्टाक का पता कर सके। इसके अंतर्गत ऑनलाइन सर्च करने पर दुकानों में स्टाक की मात्रा देखी जा सकती है। अनेक दुकानों में स्टाक प्रदर्शित होता है लेकिन भौतिक रूप से यह मात्रा वहां होती नहीं।

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