आर्थिक व्यावहारिकता के अभाव में अपने कला-कौशल को जिंदा रखने बंसोड़ों की कोशिश जारी

कोरबा 22 फरवरी। भारत के कई राज्यों को ऊर्जा आपूर्ति करने वाला कोरबा शहर, अपनी औद्योगिक चमक के पीछे कई अनछुही संस्कृति को सहेज कर रखता है। शहर के सीतामढ़ी के पास स्थित बसोर मोहल्ला, जहाँ बांस के छाल को बारीकी से उतार कर रोजमर्रा के उपयोगी सामान बनाते हुए बुजुर्ग कारीगरों की एक छोटी सी टोली रोज नजर आती है।

सडक किनारे छोटे-छोटे कारीगरों के समूह में बांस के सूप, टोकरी, पर्रा, और विभिन्न घरेलू वस्तुएँ देखते ही बनती हैं। बांस का कार्य कर रहे भैया लाल ने बताया की, बांस का काम हमारा जातिगत पेशा है, पर आज बांस की कीमत बढ़ गई है। दिन भर मेहनत करने पर दो-तीन सूप बनाते हैं और उससे केवल 200 रुपये ही कमाते हैं। हमारे आज की पीढी अब इसमें रुचि नही रखते। इसी तरह गोलन बसोर ने बताया कि एक झोपड़ी के नीचे बांस के उत्पाद तैयार करते हैं, हमबुजुर्ग हो गए हैं, बच्चे मजदूरी के लिए बाहर जाते हैं। यहाँ बांस का काम करके दो-पांच पैसा ही मिलता है. नई पीढ़ी इसे सीखना नहीं चाहती, इसलिए भविष्य में बांस के सूप और टोकरी कम ही दिखेंग।

बासोर समुदाय के कारीगरों के अनुसार, परम्परागत शिल्प को निरंतर बनाए रखने में दो मुख्य अड़चनें हैं। बाजार की घटती मांग और आर्थिक व्यावहारिकता का अभाव. आधुनिक रोजमर्रा की जरूरतों के कारण ग्राहक अब प्लास्टिक और सिंथेटिक सामग्रियों की ओर रुख कर रहे हैं, जिससे बांस के पारम्परिक उत्पादों की बिक्री में गिरावट आई है। सरकार ने बासोर कारीगरों के पुनरुत्थान हेतु कई योजनाएँ शुरू की हैं। कारीगरों को आधुनिक उपकरण, कच्चा माल और बाजार संपर्क प्रदान करने के उद्देश्य से बाँस प्रसंस्करण केंद्र शुरू किए गए है। कौशल उन्नयन प्रशिक्षण शुरू किये गए है,डिजाइन-आधारित कार्यशालाएँ, जहाँ बासोर कारीगरों को बांस के उत्पादों में आधुनिक डिजाइन और टिकाऊ तकनीकें सिखाई जाती हैं।

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