उप राष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर जताई चिंता, कहा “सुपर संसद” न बनें

नई दिल्ली। उप राष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने सुप्रीम कोर्ट के हाल के आदेश पर चिंता जताते हुए कहा कि भारत में ऐसे लोकतंत्र की कल्पना नहीं की थी, जहां न्यायाधीश ‘सुपर संसद’ के रूप में काम करेंगे और कानून बनाएंगे। उप राष्ट्रपति ने तमिलनाडु बनाम राज्यपाल मामले में आदेश का जिक्र किया जिसमें शीर्ष कोर्ट ने राष्ट्रपति को तीन माह में विधेयक पर फैसला करने की समय- सीमा तय की है। उन्होंने कहा कि ऐसा पहली बार हुआ है, जब राष्ट्रपति को तय समय में फैसला करने को कहा गया।

राज्यसभा के प्रशिक्षुओं के एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए उप राष्ट्र‌पति ने कहा कि एक फैसले में राष्ट्रपति को निर्देश दिया गया है। हमें इसे लेकर बेहद संवेदनशील होने की जरूरत है। हमने इस दिन की कल्पना नहीं की थी, जहां राष्ट्रपति को तय समय में फैसले के लिए कहा जाएगा।

धनखड़ ने कहा, अब जज विधायी मामलों पर फैसला करेंगे। वे ही कार्यकारी जिम्मेदारी निभाएंगे और सुपर संसद के रूप में काम करेंगे। उनकी कोई जवाबदेही भी नहीं होगी, क्योंकि इस देश का कानून उन पर लागू ही नहीं होता। धनखड़ ने कहा, ‘दिल्ली में एक हाईकोर्ट जज के घर जो कुछ हुआ, उस पर एक हफ्ते तक चुप्पी क्यों रही? क्या देरी सिर्फ संयोग थी या सोची- समझी रणनीति? अगर ऐसी घटना किसी आम नागरिक के घर होती तो एफआइआर दर्ज हो जाती, जांच शुरू हो जाती, सबूत सुरक्षित रखे जाते। लेकिन जब बात एक न्यायाधीश की होती है, तो नियम बदल जाते हैं। संविधान सिर्फ राष्ट्रपति और राज्यपाल को अभियोजन से छूट देता है। न्यायपालिका को यह विशेषाधिकार किसने दिया?’

परमाणु मिसाइल बन गया अनुच्छेद 142

धनखड़ ने कहा कि संविधान का अनुच्छेद 142 लोकतंत्र के खिलाफ परमाणु मिसाइल बन गया है। अनुच्छेद 142 सुप्रीम कोर्ट को पूर्ण न्याय के लिए कोई भी आदेश, निर्देश या फैसले का अधिकार देता है। उन्होंने कहा, ‘हम ऐसी स्थिति नहीं चाहते, जहां राष्ट्रपति को निर्देश दिए जाएं। आपको सिर्फ संविधान की व्याख्या का अधिकार है। वह भी 5 या ज्यादा जजों की संविधान पीठ ही कर सकती है।

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