वाइल्ड लाइफ वीक पर छत्तीसगढ़ विज्ञान सभा कोरबा में सेमिनार हुआ आयोजित

कोरबा 04 अक्टूबर। हमारे जंगल और घरों के आसपास की झाड़ियों के बीच कई ऐसी वनस्पतियां और वन्य जीव हैं, जिनका अस्तित्व खतरे में है। प्रकृति, पर्यावरण व पारिस्थितिकी तंत्र का वे महत्वपूर्ण अंग हैं। भविष्य में जीव जगत में उनका न होना असंतुलन का कारण भी बन सकता है। बीजा-सलीहा जैसी शुद्ध देसी इमारती वृक्ष और चनहौर, कलिहारी जैसी दुर्लभ बड़ी-बूटियां भी उस सूची में शामिल हैं, जिन्हें संरक्षण-संवर्धन की बजायउसकी एक सिरे से अनदेखी की जा रही है। हमें हमारी इस प्राकृतिक धरोहर को सहेजने के लिए समय रहते व्यापक और सार्थक प्रयास की जरूरत है।

उक्त कथन छत्तीसगढ़ विज्ञान सभा कोरबा इकाई सचिव दिनेश कुमार ने के.एन. महाविद्यालय में आयोजित सेमिनार में छात्र-छात्राओं से कही। आयोजित इस सेमिनार सह विशेषज्ञ व्याख्यान में वाइल्ड लाइफ वीक के अंतर्गत इस कार्यक्रम में वन विशेषज्ञ दिनेश कुमार ने खासकर वन्य जीव संरक्षण व वन अधिनियम पर ध्यान केंद्रित करते हुए अनेक बातें साझा की। उन्होंने टेक्सोनॉमी, वन्य जीव व वनस्पतियों की पहचान व वर्गीकरण समेत प्रकृति-पर्यावरण, वन्य जीव व वनस्पतियों के धीरे-धीरे समाप्ति की ओर बढ़ने के कारणों के साथ उन्हें सहेजने की विधियों पर भी चर्चा की। कार्यक्रम प्राचार्य डॉ. प्रशांत बोपापुरकर के मार्गदर्शन में आयोजित किया गया था।

अनियंत्रित दोहन से खत्म हो रहीं दुर्लभ जड़ी-बूटियां
दिनेश कुमार ने बताया कि सदियों से भारत के वन्य क्षेत्रों में रहने वाले लोग अपने मर्ज के लिए जड़ी-बूटियों का बखूबी प्रयोग करते रहे हैं। अब न उन दुर्लभ वनस्पतियों की पहचान करने वाले विरले हैं, उन जड़ी-बूटियों का अस्तित्व भी धूमिल होता जा रहा है। औषधीय गुणों वाली इन वनस्पतियों में सफेद मूसली, चनहौर और कलिहारी भी शामिल हैं, जो अनियंत्रित दोहन के चलते विलुप्ति की कगार पर हैं। आने वाली पीढ़ी के लिए संरक्षित करना और भी जरूरी हो जाता है।

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