चार पेड़ों में हो रही कमीः चिरौंजी के उत्पादन पर असर, महंगे ड्राईफु्रट के रूप में होता है उपयोग

कोरबा 04 अप्रैल। जिले के जंगल में चार फल के पेड़ों में आ रही कमी के कारण अब चिरौंजी भी दुर्लभ उपज की श्रेणी में आने लगा है। दरअसल ग्रामीणों द्वारा चिरौंजी के लालच में चार फल को पकने से पहले ही तोड़ लिया जाता है जिससे नए पौधे पनप नहीं पाते। पेड़ों के संरक्षण के लिए भी कोई कदम नहीं उठाया जा रहा है।

शीतल पेय, मीठा सहित विभिन्न खाद्य सामानों का स्वाद बढ़ाने के लिए चिरौंजी उपयोग किया जाता है। खासतौर पर मीठे में ज्यादा इस्तेमाल किया जाता है। चिरौंजी ड्रायफूड की भी श्रेणी में आता है। 1500 से 1800 रूपये किलो तक बिकता है। जिले के दूरस्थ वन क्षेत्र लेमरू, पसरखेत, कोलगा, मदनपुर आदि क्षेत्रों में सघन पेड़ थे जो अब विरल होने लगे हैं.। इसका मुख्य कारण पेड़ों की कटाई और लोगों में जागरूकता की कमी है। लोग पकने से पहले ही चार को तोड़ लेते है। कोरबा जिले के शेखर प्रसाद ने बताया कि एक समय था जब खुले बाजार में चार फल खाने के लिए बिकता था। पके हुए चार फल को खाने का स्वाद अलग होता है, मगर अब चार फल बाजार से गायब हो चुका है। दरअसल चिरौंजी के लालच में लोग पकने से पहले ही फल को तोड़ लेते है, जिससे अब खाने को नहीं मिलता। पके हुए चार फल को पक्षी खाते हैं और उसके बीज डिस्पार्सल करते है। इसी तरह आम लोग भी खाने के बाद बीज को फेंक देते है जिससे नए पौधे बनते है। मगर पिछले कुछ सालों से फल को कच्चा ही संग्रहण करने का चलन बढ़ा है जिसका दुष्परिणाम है कि चार पेड़ों की तादात में लगातार कमी आई है।

कोरबा जिले के जंगल में साल-सागौन के अलावा विभिन्न प्रजाति के पेड़ मौजूद हैं। महुआ, तेंदू, डोरी, चार फल समेत अनेकों वनोपज मिलते है। आदिवासी ग्रामीण सदियों से इन्हीं वनोपज का संग्रहण कर अपनी जीविका चलाते आ रहे है और अच्छी आमदनी भी कमाते है। मगर वर्तमान परिवेश में खासकर चार फल के पेड़ में कमी देखी जा रही है, जो चिंता का विषय है। अगर समय रहते चार पेड़ के संरक्षण की ओर ध्यान नहीं दिया गया तो मिठाई से चिरौंजी गायब हो जाएगा और आने वाला जनरेशन सिर्फ किताबों या इंटरनेट पर चार फल की तस्वीर ही देख पायेगा।

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