
भगवती पार्वती की आराधना का सौभाग्य व्रत- हरितालिका


शिवपुराण के अनुसार एक बार बाहर द्वार पर नंदी को बैठाकर पार्वती स्नान कर रही थी, कि शिव बाहर से टहलते हुए आए और भीतर जाने लगे। नन्दी ने उन्हें बहुत रोका-टोका पर वे किसके रोके रूकने वाले थे ? वे नन्दी को डांट-फटकार कर भीतर चले ही गए। पार्वती उन्हें देखकर बहुत लजा गई। तब उनकी सखी जया-विजया ने उनसे कहा – ‘‘शिवजी के तो सैकड़ों सेवक हैं, आपके कोई नहीं है। आप भी एक सेवक बना खड़ा कीजिये।’’ कहने भर की देर थी, अपने शरीर से छुड़ाया हुआ उबटन लेकर भाद्रपद कृष्णा चतुर्थी के दिन उन्होंने एक सुन्दर पुरूष बना खड़ा करके उसे जिला दिया और कहा – ‘‘तुम मेरे बेटे हो, सारे गुण तुममें आ भरेंगे और कोई माई का लाल तुम्हें जीत नहीं पावेगा।’’ यह कहकर उन्होंने उसे गोद में उठा बैठाया और कहा – ‘‘आज से तुम मेरे द्वारपाल हो गए। मुझसे बिना पूछे कोई भीतर न आने पाये चाहे वह कोई भी क्यों न हो।’’