बढ़ती संसाधन के चलते ‘देसी फ्रिज’ सुराही की पूछपरख हुई कम

गर्मी में जन स्वास्थ्य की दृष्टि से काफी महत्व

कोरबा 15 अपै्रल। जिले में बदलते समय के साथ पारंपरिक जीवनशैली की कई निशानियां धीरे-धीरे खत्म होती जा रही हैं।कभी हर घर की पहचान रही मिट्टी की सुराही अब बाजारों से लगभग गायब हो चुकी है। पतली लंबी गर्दन और गोल-मटोल पेट वाली यह सुराही एक समय ‘देसी फ्रिज’ के रूप में जानी जाती थी, जिसमें रखा पानी प्राकृतिक रूप से ठंडा और बेहद स्वादिष्ट होता था।

गर्मी के दिनों में पहले लगभग हर घर में सुराही में पानी भरकर रखा जाता था.इसकी खासियत थी कि यह बिना बिजली के पानी को ठंडा रखती थी और उसमें मिट्टी की सोंधी खुशबू भी बनी रहती थी लेकिन आधुनिक तकनीक और फ्रिज के बढ़ते उपयोग के कारण अब इस पारंपरिक बर्तन की मांग तेजी से घट गई है। कोरबा जिले के निवासी प्रजापति समुदाय के प्रतिनिधि हरिशंकर बताते हैं कि पहले जहां मिट्टी के बर्तनों, खासकर सुराही की अच्छी-खासी मांग होती थी, वहीं अब हालात पूरी तरह बदल चुके हैं उनका कहना है कि आज के समय में बाजार में मिट्टी के मटके भी गिनती के ही बिकते हैं, जबकि सुराही की मांग लगभग खत्म हो चुकी है। यही वजह है कि कारीगरों ने अब सुराही बनाना लगभग बंद कर दिया है। मृदा आधारित व्यवस्था पर काम कर रहे हरिशंकर ने कहा कि जब किसी वस्तु की मांग नहीं रहती, तो उसे बनाना भी घाटे का सौदा बन जाता है। यही कारण है कि नई पीढ़ी के कुम्हार इस पारंपरिक कला से दूर होते जा रहे हैं.धीरे-धीरे यह शिल्प और इससे जुड़ी पहचान भी खत्म होने के कगार पर है।

ग्रामीण विषयों के जानकार शैलेंद्र नामदेव ने बताया कि सुराही सिर्फ एक बर्तन नहीं, बल्कि हमारी सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा रही है। यह पर्यावरण के अनुकूल होने के साथ-साथ स्वास्थ्य के लिए भी फायदेमंद थी, क्योंकि मिट्टी के बर्तन में रखा पानी प्राकृतिक रूप से शुद्ध और ठंडा रहता है। आज जरूरत इस बात की है कि लोग पारंपरिक वस्तुओं के महत्व को समझें और उन्हें अपने जीवन में फिर से स्थान दें.यदि ऐसा नहीं हुआ, तो आने वाली पीढियां सिर्फ किताबों और कहानियों में ही सुराही के बारे में जान पाएंगी।

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