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सेवा संकल्प शिविर पर बड़ा सवाल : 200 यूनिट के लक्ष्य के सामने सिर्फ 21 रक्तदाता, लाखों के खर्च के बाद भी भीड़ नदारद !

10 बेड, 20 स्टाफ और करीब 100 स्वास्थ्यकर्मियों की टीम… लेकिन इलाज कराने पहुंचे महज 200 लोग

कोरबा, 23 सितंबर 2026। अपने भ्रष्ट आचरण के लिए मशहूर कोरबा सीएमएचओ डॉ सूर्यनारायण केशरी का एक बार फिर बड़ा फेलियर सामने आया है। सरकारी आयोजनों में बड़े-बड़े दावे, भारी तैयारियां और लाखों रुपये का खर्च… लेकिन जब वास्तविक जरूरतमंदों तक सेवाएं पहुंचाने की बारी आई तो पूरा आयोजन ही सवालों के घेरे में आ गया। कोरबा में ‘सेवा संकल्प अभियान’ के तहत आयोजित वृहद स्वास्थ्य एवं महारक्तदान शिविर में 200 यूनिट रक्त संग्रह का लक्ष्य रखा गया था, लेकिन मौके पर उपलब्ध जानकारी के मुताबिक महज 21 लोगों ने ही रक्तदान किया।

सवाल सिर्फ रक्तदान के लक्ष्य का नहीं है। स्वास्थ्य शिविर के लिए 10 बेड और करीब 20 स्टाफ की व्यवस्था की गई थी। इसके अलावा लगभग 100 चिकित्सा कर्मियों की टीम तैनात होने की बात सामने आई, लेकिन पूरे आयोजन के दौरान करीब 200 लोगों ने ही उपचार एवं स्वास्थ्य सेवाओं का लाभ लिया। ऐसे में अब सवाल उठ रहा है कि कलेक्टर साहब को झूठा सब्जबाग दिखाकर CMHO ने इतनी बड़ी तैयारी आखिर किसके लिए की गई थी और आम नागरिकों तक इसकी जानकारी पहुंचाने के लिए प्रचार-प्रसार कितना प्रभावी रहा ?

200 यूनिट का लक्ष्य… 21 यूनिट पर सिमटा रक्तदान

महारक्तदान शिविर का उद्देश्य बड़े पैमाने पर रक्त संग्रह करना था। इसके लिए 200 यूनिट का लक्ष्य रखा गया था। लेकिन मौके पर सिर्फ 21 लोगों के रक्तदान की जानकारी सामने आई है। यानी लक्ष्य के मुकाबले रक्तदान बेहद कम रहा। वो भी 20 ब्लड कॉमन ग्रुप ही रहा है। ये वो समय है जब CMHO ने DMFT से ब्लड बैंक एम्बुलेंस आबंटित करा लिया है।

विडंबना यह है कि रक्तदान के लिए अधिकारियों और कर्मचारियों की मौजूदगी के बावजूद आम लोगों की अपेक्षित भागीदारी नहीं जुट सकी। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल आयोजन की पब्लिसिटी और जनसंपर्क व्यवस्था पर खड़ा होता है।

इलाज के लिए 100 लोगों की टीम, मरीज सिर्फ 200 !

स्वास्थ्य शिविर को वृहद स्वरूप देने के लिए बड़ी संख्या में चिकित्सकीय अमला लगाया गया। मतलब पूरा का पूरा मेडिकल कॉलेज अस्पताल का अमला खड़ा था ! अलग-अलग स्वास्थ्य सेवाओं के लिए करीब 100 लोगों की चिकित्सा टीम मौजूद होने की बात सामने आई है। लेकिन पूरे शिविर में करीब 200 से 300 लोगों ने ही उपचार अथवा स्वास्थ्य सेवाओं का लाभ लिया।

यानी इतनी बड़ी टीम, इतने संसाधन और इतनी तैयारियों के बावजूद आम नागरिकों की भागीदारी उस स्तर तक नहीं पहुंच सकी, जिसकी उम्मीद एक ‘वृहद स्वास्थ्य शिविर’ से की जाती है। सवाल यह है कि यदि जरूरतमंदों को ही आयोजन की जानकारी नहीं मिली, तो फिर इतनी बड़ी व्यवस्था का उद्देश्य क्या रह गया ?

500 लोगों के खाने की व्यवस्था का दावा, भीड़ कहां गई ?

आयोजन से जुड़े सूत्रों के मुताबिक शिविर में करीब 500 लोगों के भोजन की व्यवस्था किए जाने की तैयारी थी। दूसरी ओर स्वास्थ्य सेवाओं का लाभ लेने वालों की संख्या करीब 200 बताई जा रही है। ऐसे में भोजन व्यवस्था और वास्तविक उपस्थिति को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं।

यहां सबसे बड़ा सवाल खर्च का है। सूत्रों के मुताबिक पूरे आयोजन पर 5 लाख रुपये से अधिक खर्च होने की बात सामने आ रही है। हालांकि इस राशि की आधिकारिक पुष्टि और मदवार खर्च का विवरण अभी सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आया है। यदि खर्च वास्तव में इतना हुआ है तो आयोजन की लागत के मुकाबले वास्तविक जनलाभ का मूल्यांकन किया जाना जरूरी है।

क्या प्रचार-प्रसार की कमी बनी आयोजन की सबसे बड़ी वजह ?

पूरे मामले में स्वास्थ्य विभाग के मुखिया सीएमएचओ डॉ. एस.एन. केसरी की भूमिका पर सवाल उठ रहे हैं। आरोप है कि इतने बड़े स्वास्थ्य एवं रक्तदान शिविर के लिए जिस स्तर का जनसंपर्क और प्रचार-प्रसार होना चाहिए था, वह जमीन पर दिखाई नहीं दिया।

किसी भी स्वास्थ्य शिविर की सफलता सिर्फ डॉक्टर, बेड और दवाइयां उपलब्ध कराने से तय नहीं होती। असली सफलता इस बात से तय होती है कि कितने जरूरतमंद लोगों तक जानकारी पहुंची, कितने लोग पहुंचे और कितने लोगों को वास्तविक लाभ मिला। यदि करोड़ों नहीं तो लाखों की व्यवस्था के बीच शिविर में अपेक्षित संख्या में लोग ही नहीं पहुंच पाए, तो इसकी जिम्मेदारी तय करने की जरूरत है।

सरकारी दावे और जमीनी हकीकत में कितना अंतर ?

आयोजन के बाद जारी प्रचार सामग्री में स्वास्थ्य जांच, आयुष्मान कार्ड, टीबी स्क्रीनिंग, नेत्र परीक्षण, आयुष सेवाएं, निःशुल्क दवाइयां और महारक्तदान जैसी कई सुविधाओं का उल्लेख किया गया। लेकिन जमीनी आंकड़े अब आयोजन की प्रभावशीलता पर सवाल खड़े कर रहे हैं।

खास बात यह है कि 22 सितंबर को सेवा संकल्प अभियान की समीक्षा के दौरान अधिकारियों को व्यापक जनभागीदारी सुनिश्चित करने तथा प्रचार-प्रसार के माध्यमों से लोगों को जोड़ने के निर्देश भी दिए गए थे। ऐसे में अगले ही दिन आयोजित बड़े स्वास्थ्य कार्यक्रम में अपेक्षित भीड़ नहीं जुटना व्यवस्था और प्रचार तंत्र की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करता है।

अब उठ रहे हैं पांच बड़े सवाल

1. जब रक्तदान का लक्ष्य 200 यूनिट था तो केवल 21 रक्तदाताओं तक आयोजन क्यों सिमट गया ?

2. करीब 100 स्वास्थ्यकर्मियों की टीम लगाने के बावजूद स्वास्थ्य सेवाओं का लाभ लेने वालों की संख्या करीब 200 ही क्यों रही ?

3. यदि 500 लोगों के भोजन की व्यवस्था की गई थी तो वास्तविक लाभार्थियों की संख्या कितनी थी ?

4. यदि आयोजन पर 5 से 10  लाख रुपये से अधिक खर्च हुआ है तो इसका मदवार विवरण सार्वजनिक क्यों नहीं किया गया ?

5. इतने बड़े आयोजन से पहले व्यापक प्रचार-प्रसार की जिम्मेदारी किस अधिकारी की थी और लक्ष्य पूरा नहीं होने पर जवाबदेही किसकी तय होगी ?

आयोजन बड़ा, लेकिन नतीजा छोटा ?

‘सेवा संकल्प’ का मूल उद्देश्य ही जनसेवा और जनभागीदारी है। प्रदेश स्तर पर भी अधिकारियों को अभियान को व्यापक जनभागीदारी से जोड़ने और गतिविधियों को प्रभावी बनाने के निर्देश दिए गए हैं।

ऐसे में कोरबा के इस आयोजन के आंकड़े एक असहज तस्वीर सामने रखते हैं—200 यूनिट रक्तदान का लक्ष्य, सिर्फ 21 रक्तदाता; बड़ी चिकित्सा टीम, लेकिन करीब 200 लाभार्थी; सैकड़ों लोगों के भोजन की तैयारी और लाखों के संभावित खर्च की चर्चा।

अब जरूरत है कि स्वास्थ्य विभाग इस पूरे आयोजन का वास्तविक खर्च, रक्तदान का आधिकारिक आंकड़ा, कुल लाभार्थियों की संख्या, तैनात मानव संसाधन और प्रचार-प्रसार पर हुए खर्च का सार्वजनिक ब्यौरा सामने रखे। तभी यह स्पष्ट होगा कि ‘सेवा संकल्प’ वास्तव में जरूरतमंदों तक पहुंचा या फिर यह भी सरकारी आयोजनों की भीड़ और आंकड़ों की औपचारिकता बनकर रह गया।

संबंधित आंकड़े सूत्रों से प्राप्त जानकारी पर आधारित हैं। इनका आधिकारिक दस्तावेजी सत्यापन किया जाना बाकी है। संबंधित स्वास्थ्य विभाग/सीएमएचओ का पक्ष प्राप्त होने पर उसे भी प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा।

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R.O. No. 13952/23