March 8, 2026

सूत्र पटल@ आत्मा रंजन

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प्रस्तुति- सरिता सिंह

एक लोक वृक्ष के बारे में


मदनू के मगनू तक उच्चारणों में
बोला जाता हुआ तुम्हारा नाम
जिज्ञासा और रहस्य से लिपटा है आज
तुम्हारे व्यकितत्व की ही मानिंद
मौन व्याधि तोड़ कुछ तो बताओ अपने बारे में
क्यों पूर्व की ओर ही गाए जाने हैं तुम्हारे पांगे*
जी जान लुटाने के बाद भी कलेजा माँगती
निष्ठुर नायिका का समर्पित प्रेमी
कसक भरी मनुहार गुहार क्यों लगाता है तुम्हारे ही पास!

सबकुछ जानने वाले भी कुछ नहीं जानते तुम्हारे बारे में
चिड़िया की भाषा में चहकते हो तुम
बूंदों की भाषा में थिरकते
बसंत और पतझड़ की भाषा में खिलते और सुबकते
चीख़ तक के लिए इस बहरे समय में
जानेगा भी कौन तुम्हारे नि:शब्द को

पीपल की तरह बस्ती के बीचों-बीच
शुचिता के ऊंचे चबूतरे पर विराजमान
नहीं हो तुम पूजा के पात्र
देवदार की मानिंद नहीं है तुम्हारे पास
देव संस्कृति से जुड़े होने का गौरव
था महान ग्रंथों में दर्ज मुग्धकारी इतिहास
धर्म की अलौकिकता
या इतिहास की स्वर्णिमता से ग्रस्त
तुम नहीं हो कोई महान धर्माचारी या महानायक
औषध गुणों या फलदायी उपयोगितावाद के
लिजलिजे लगाव से मुक्त
एक संपूर्ण वृक्ष की सार्वजनिक दाय लिए
तमाम सायास क्रियाओं से अछूते
किसी धार घाटी या नाले में
या फिर अपनी मनपसंद जगह
बावड़ी के खबड़ीले टोडे पर
समूची मानवीय हलचल में डोलते लह्राते रहे हो
मदन जैसे आकर्षक मजनू से समर्पित
सदियों से लोकगीतों में गाए जाते
एक ठेठ लोक नायक हो तुम
बांवड़ी के जल को अपनी जड़ों की मार्फ़त
सौंपते रहे हो ह्रदय ठंडक और मिठास
भर दोपहर बोझा लादे खड़ी चढ़ाई का दंभ रौंदते
पसीने नहाए बदन और सूखते कंठ के लिए
ठण्डे पानी की घूँट के साथ
तुम्हारे पास है-ठणडी हवा और घनी छाया की राहत

भरे जाते हुए मटकों, गागरों औरटोकणियों** की
हर एक ध्वनि के ध्यानार्थ से परिचित हो तुम

जानते हो ख़ाली बर्तन का इतिहास
और भरे हुए बर्तन का भविष्य
पनिहारनों और घासियारनों के बतियाए जाते हुए
सुख-दुःख के मर्म को समझते हो तुम

पूरी सहजता के साथ
जंगली फूल की तरह चुपचाप कहीं
उपजते उमगते उमड़ते प्रेम के
सूमूचे सुख और समूची यातना के
सच्चे साक्षी रहे हो तुम
बनते रहे हो उनके लोकगीतों की टीसती टेर

अलबत्ता सीडी में में सजाए जा रहे
टैक्सियों में पर्यटकों को परोसे जा रहे
डिस्को ताल लोकगीतों में
कहीं नहीं है तुम्हारा ज़िक्र
अपेक्षित बाबड़ियों के
वीरान किनारों पर भी
बिल्कुल वैसे ही खड़े हो तुम
इस बात गवाही देते
कि जो पूजा नहीं जाता
नहीं होता इतिहास के गौरमयी पन्नों में दर्ज
वह भी अच्छा हो सकता है।

नई सदी में टहलते हुए


बोलता जा रहा लगातार
बड़बड़ाता सा खींचता हुआ उसकी कमीज़
नहीं विक्षिप्त नहीं है बच्चा
दरअसल सुनने वाले कानो में
चिपका हुआ है मोबाईल
और वे मग्न है अपनी दुनिया में
आँखें भी हैं आगे ही आगे
बच्चे से कहीं ऊँची खीजता हुआ
रूआँसा बच्चा चुप है अब गुमसुम
ढीली पड़ती जा रही
अंगुली पर उसकी पकड़
वह सोच रहा एक और विकल्प
पापा के साथ टहलने से तो अच्छा था
घर पर बी.डी.ओ. गेम खेलना
उसका इस तरह सोचना
इस सदी का एक ख़तरनाक हादसा है
बहुत ज़रूरी है कि कुछ ऐसा करें
कि बना रहे यह अँगुलियों का स्नेहिल स्पर्श
और जड़ होती सदी पर
यह नन्हीं स्निग्ध पकड़
कि बची रहे
पकड़ जितनी नर्म ऊष्मा
ताकि बची रहे यह पृथवी।

रास्ते


डिगे भी हैं
लड़खड़ाए भी
चोटें भी खाई कितनी ही

पगडंडियाँ गवाह हैं
कुदालियों , गैतियों
खुदाई मशीनों ने नहीं
कदमों ने ही़ बनाए हैं__
रास्ते !

पृथ्वी पर लेटना


पृथ्वी पर लेटना सचमुच
पृथ्वी को भेंटना ही हैं
कौन समझाए विजेताओं
बुध्दिमानों को
कि लेटना न सही
वे सीख ले कम से कम
पृथ्वी पर लौटना
वह तो दूर की बात हैं
जानता है जो एक मनमौजी बच्चा
असीम सुख का असीम स्वाद
कि क्या हैं—
पृथ्वी पर लोटना !

चक्रवात


अनिवार्य होती हैं हवाएँ
जीवन के लिए
ठीक वैसे ही जैसे —
प्रेम

सब कुछ ही तो लगता हैं सहज
पता नहीं चलता
कब बनता
आता हैं कहाँ से
चक्रवात

पीछे छोड़ जाता
अपने नकूश
सब कुछ उदास
उजडा़
वीरान |

#

हाँडी


जानती हो तुम कि काठ की हाँडी
एक बार ही चढ़ती है
मंज़ूर नहीं था तुम्हें शायद
यूँ एक साथ चढ़ना
और जल जाना निरर्थक
इसलिए चुन ली तुमने
एक धातु की उम्र
धातु को मिला फिर
एक रूप एक आकार
हाँडी, पतीली, कुकर, या कड़ाही जैसा
मैं जानना चाहता हूँ
हाँडी होने का अर्थ
तान देती है जो ख़ुद को लपटों पर
और जलने को
पकने में बदल देती है

सच-सच बताना
क्या रिश्ता है तुम्हारा इस हाँडी से
माँजती हो इसे रोज़
चमकाती हो गुनगुनाते हुए
और छोड़ देती हो एक हिस्सा
जलने की जागीर सा खामोशी से

कोई औपचारिक सा ख़ून का रिश्ता मात्र
तो नहीं जान पड़ता
गुनगुनाने लगती है यह
तुम्हारे संग एक लय में
खुद्बुदाने लगती है
तुम्हारी कड़छी और छुवन मात्र से
उठाने लगती है महक
उगलने लगती है
स्वाद का रहस्य

खीजती नहीं हो कभी भी इस पर
न चढ़ पाने का दु:ख यद्यपिर
साझा करती है यह तुम्हारे संग
और तुम इसके संग
भरे मन और ख़ामोश निगाहों से

सच मैं जानना चाहता हूँ
कैसा है यह रिश्ता?

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Markandey Mishra

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