धमतरी। खेती में पानी की बचत, लागत में कमी और पर्यावरण संरक्षण—इन तीन लक्ष्यों को साथ लेकर धमतरी जिले का जोरातराई गांव नई पहचान बनाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। कुरूद विकासखंड के इस गांव को छत्तीसगढ़ का पहला ‘कार्बन न्यूट्रल विलेज’ बनाने की पहल की जा रही है। इस मॉडल में आधुनिक कृषि तकनीक के जरिए धान की खेती को अधिक टिकाऊ बनाने और किसानों के लिए अतिरिक्त आमदनी के अवसर तैयार करने पर जोर है।
जोरातराई में परियोजना का 95 प्रतिशत काम पूरा
प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार, जोरातराई में वैकल्पिक जल प्रबंधन तकनीक यानी एडब्ल्यूडी (AWD) को अपनाया जा रहा है। परियोजना के शुरुआती चरण में जोरातराई समेत धमतरी जिले के 14 गांवों को इस मॉडल से जोड़ा गया है। रिपोर्ट में जोरातराई में 95 प्रतिशत ऑन-बोर्डिंग, कैलिब्रेशन और क्रियान्वयन का काम पूरा होने की जानकारी दी गई है।
इस पहल का उद्देश्य खेती में पानी और उर्वरकों का बेहतर उपयोग करना तथा धान के खेतों से निकलने वाली मीथेन गैस के उत्सर्जन को कम करना है।
क्या है AWD तकनीक, कैसे होगा फायदा?
धान की पारंपरिक खेती में खेतों में लंबे समय तक पानी भरा रखा जाता है। एडब्ल्यूडी तकनीक में खेत की स्थिति के अनुसार सिंचाई की जाती है और एक बार पानी देने के बाद खेत को कुछ समय तक सूखने दिया जाता है। निर्धारित स्तर तक नमी कम होने पर दोबारा पानी दिया जाता है।
रिपोर्ट में इस तकनीक से सिंचाई के पानी में 20 से 30 प्रतिशत तक बचत और यूरिया के उपयोग में कमी की संभावना बताई गई है। इससे किसानों की खेती की लागत घटाने और धान उत्पादन को पर्यावरण के अनुकूल बनाने में मदद मिल सकती है।
कार्बन क्रेडिट से अतिरिक्त कमाई की उम्मीद
इस परियोजना में कार्बन क्रेडिट को भी किसानों की संभावित अतिरिक्त आय का माध्यम माना गया है। खेती के दौरान ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में सत्यापित कमी होने पर कार्बन क्रेडिट तैयार किए जा सकते हैं, जिनकी बिक्री से राजस्व मिलने की संभावना रहती है।
रिपोर्ट के मुताबिक, जिला प्रशासन और कार्बन प्रोजेक्ट डेवलपर संस्था ‘पृथ्वी’ के सहयोग से यह पहल संचालित की जा रही है। परियोजना में किसानों को पंजीकरण शुल्क या उपकरणों के लिए पैसा नहीं देना पड़ रहा है। नमी मापने के लिए जरूरी उपकरण उपलब्ध कराने की भी जानकारी दी गई है।
1.10 लाख हेक्टेयर क्षेत्र तक विस्तार का लक्ष्य
रिपोर्ट में परियोजना के व्यापक विस्तार की योजना का भी उल्लेख है। आने वाले वर्षों में लगभग 1.10 लाख हेक्टेयर क्षेत्र को इस पहल से जोड़ने और किसानों को करीब 250 करोड़ रुपये का अतिरिक्त राजस्व दिलाने का लक्ष्य बताया गया है। यह अनुमानित लक्ष्य है; वास्तविक आय परियोजना के विस्तार, कार्बन उत्सर्जन में सत्यापित कमी और कार्बन क्रेडिट की बिक्री पर निर्भर करेगी।
क्या दूसरे गांवों के लिए मॉडल बनेगा जोरातराई?
जोरातराई की पहल सफल रहती है तो यह धान उत्पादक क्षेत्रों में जल संरक्षण, लागत नियंत्रण और पर्यावरण अनुकूल खेती के लिए उपयोगी उदाहरण बन सकती है। हालांकि, इसकी वास्तविक सफलता पानी की बचत, फसल उत्पादन, खेती की लागत और किसानों को मिलने वाली अतिरिक्त आय के आंकड़ों से ही स्पष्ट होगी।
फिलहाल, धमतरी का जोरातराई गांव टिकाऊ खेती की दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रयोग के तौर पर सामने आया है। अब इस मॉडल के परिणाम और किसानों को मिलने वाले वास्तविक लाभ पर नजर रहेगी।
