बांकीमोंगरा में भाजपा-कांग्रेस का बिगड़ा समीकरण

उपाध्यक्ष बनना है तो निर्दलीय पार्षदों को लाना होगा पाले में

कोरबा 24 फरवरी। जिले की नवगठित बांकीमोंगरा नगर पालिका के पहले चुनाव में भारतीय जनता पार्टी की सोनी झा अध्यक्ष बनने में सफल रहीं। उनके सामने 6 और उम्मीदवार थे। एक निर्दलीय के द्वारा 3600 वोट काटे जाने से कांग्रेस को झटका लगा। वहीं 30 सदस्यों वाली नगर पालिका में भाजपा और कांग्रेस के पार्षद अनुकूल संख्या में नहीं आ सके हैं। निर्दलीय किंगमेकर हैं इसलिए उनकी रेटिंग के चक्कर में खेल काफी उलझ गया है। बांकीमोंगरा नगर पालिका में भाजपा के 10 पार्षद ही जीत सके जबकि कांग्रेस के 13 निर्दलीय 6 और बसपा के एक उम्मीदवार को जीत मिली। इस तरह से बहुमत किसी के पास नहीं है। सभापति और उपाध्यक्ष को लेकर यहां समीकरण गड़बड़ाए हुए नजर आ रहे हैं।

इस बीच खबर है कि एक निर्दलीय ने भाजपा और एक ने कांग्रेस को समर्थन देना घोषित किया है। शेष चार के रूख के बारे में पता नहीं है और वे किसी का भी खेल बनाने-बिगाडने का पूरा दमखम रखते हैं। इसके लिए सौदेबाजी पर सभी का जोर है और निगाहें भी टिकी हैं। छोटे-चुनाव में इसी प्रकार की रणनीति सफल होती है चाहे इसके लिए कुछ भी कीमत क्यों न अदा करनी पड़े। स्थानीय स्तर पर कहा जा रहा है कि जिस भी पार्टी को यहां अपना उपाध्यक्ष फिक्स करने के मामले में खरीद-फरोख्त पर विशेष ध्यान देना ही होगा। जरा सी भी चूक करने का मतलब इस पद को गंवाने का होगा। वहीं जानकार सूत्रों ने यह आशंका भी जताई है कि कई बार चुनाव से पहले लंबे दौरे, कई प्रकार के गुरुमंत्र और आश्वासन दिए जाने व हर स्तर पर संतुष्ट करने के बावजूद मतदान की स्थिति में क्रास वोटिंग हो जाती है। कोरबा जिले में पुराने अनुभव लोगों की यादों में बसे हुए हैं, पर उन्हें यह भी मालूम है कि वोट लेने के लिए निर्दलियों की मनमानी शर्त को स्वीकार करना मजबूरी हो जाती है। सूत्रों के अनुसार कुसमुंडा क्षेत्र से निर्वाचित पार्षद तेज कुमार और बांकी क्षेत्र से निर्वाचित अश्वनी मिश्रा का सिंगल नाम उपाध्यक्ष के तौर पर रेस में शामिल बताया जा रहा है। अगर कोई अन्य अपने पत्ते खोल सकता है तो वह भी रेस का हिस्सा हो सकता है।

राजनीतिक हल्के में बांकीमोंगरा के परिणामों को लेकर कई प्रकार की चर्चाएं हैं। कहा जा रहा है कि यहां कुछ लोगों ने कमला बरेठ को इसलिए चुनाव में हरवा दिया क्योंकि वे उपाध्यक्ष की दावेदार हो सकती थी। लेकिन इसी चक्कर में कई और चेहरे निपट गए। इसका खामियाजा भाजपा को उठाना पड़ा है। साख भी प्रभावित हुई है।

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