ब्लैक deer
R.O. No. 13952/23
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सारंगढ़-बिलाईगढ़ जिले के गोमर्दा वन्यजीव –  छत्तीसगढ़ के वन्यजीव संरक्षण के लिए एक अच्छी खबर सामने आई है। सारंगढ़-बिलाईगढ़ जिले के गोमर्दा वन्यजीव अभयारण्य में करीब पांच दशक बाद काले हिरणों को फिर से बसाने की तैयारी की जा रही है। इसके तहत बरनवापारा अभयारण्य से 50 ब्लैकबक को यहां लाया जाएगा। वन विभाग की योजना है कि इन हिरणों को चरणबद्ध तरीके से नए प्राकृतिक आवास में छोड़ा जाए, ताकि वे वहां के वातावरण के अनुकूल हो सकें।

वन विभाग को उम्मीद है कि इस पहल से गोमर्दा अभयारण्य में वन्यजीवों की विविधता बढ़ेगी और क्षेत्र की प्राकृतिक विरासत को मजबूत करने में मदद मिलेगी। अधिकारियों के मुताबिक, गोमर्दा और बरनवापारा के बीच करीब 70 किलोमीटर की दूरी है। दोनों क्षेत्रों की प्राकृतिक परिस्थितियां काफी हद तक समान हैं, जिससे काले हिरणों को नए ठिकाने पर बसाने में मदद मिल सकती है।

शिकार और विकास के कारण खत्म हो गई थी आबादी

वन्यजीवों के शिकार, अवैध गतिविधियों, जंगलों में अतिक्रमण और बढ़ते विकास कार्यों के कारण गोमर्दा क्षेत्र से काले हिरण धीरे-धीरे गायब हो गए थे। बताया जाता है कि 1970 के दशक तक इस इलाके में उनकी मौजूदगी खत्म हो गई थी। अब वन विभाग इस प्रजाति को दोबारा बसाकर पुराने प्राकृतिक संतुलन को बहाल करने की दिशा में काम कर रहा है।

बरनवापारा में सफल रहा संरक्षण अभियान

काले हिरणों को दोबारा बसाने का प्रयोग छत्तीसगढ़ के बरनवापारा अभयारण्य में पहले ही अच्छे नतीजे दे चुका है। वर्ष 2017-18 में यहां दिल्ली के नेशनल जूलॉजिकल पार्क और बिलासपुर के कानन पेंडारी से कुल 77 ब्लैकबक लाए गए थे। अधिकारियों के अनुसार, इस पहल के बाद बरनवापारा में इनकी संख्या बढ़कर 150 से अधिक हो गई है। इसी अनुभव के आधार पर गोमर्दा में भी पुनर्वास की योजना आगे बढ़ाई जा रही है।

पर्यटन और स्थानीय रोजगार को मिलेगी रफ्तार

गोमर्दा अभयारण्य में काले हिरणों की वापसी से वन्यजीव पर्यटन को बढ़ावा मिलने की संभावना है। पर्यटकों की दिलचस्पी बढ़ने से आसपास के गांवों में रोजगार के नए अवसर पैदा हो सकते हैं। इससे स्थानीय लोगों को पर्यटन से जुड़ी गतिविधियों में भागीदारी का मौका भी मिल सकता है।

मन की बात में पीएम मोदी ने की थी तारीफ

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 26 अप्रैल को अपने मन की बात कार्यक्रम में देश में काले हिरणों के संरक्षण से जुड़े प्रयासों की सराहना की थी। अब गोमर्दा में इन्हें फिर से बसाने की तैयारी को छत्तीसगढ़ में वन्यजीव संरक्षण की दिशा में एक अहम कदम माना जा रहा है। हालांकि, इस अभियान की वास्तविक सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि हिरण नए आवास में कितनी अच्छी तरह अनुकूलित होते हैं और उनके संरक्षण की व्यवस्था कितनी प्रभावी रहती है।

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