शिवाय हॉस्पिटल को राजनैतिक संरक्षण ! 17 दिन से अवैध संचालित अस्पताल पर कार्रवाई नहीं, सीएमएचओ के हाथ क्यों कांप रहे ? सत्ता का रसूख या अंदर टेबल हुई है बात ? स्वास्थ्य मंत्री ने दूरी बनाई, फिर भी लखनलाल देवांगन पहुंचे… विरोधाभास ने बढ़ाए संदेह

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2 को आवेदन, 5 से इलाज, 7 को शुभारंभ — क्या नियम सिर्फ कागजों तक सीमित ?

कोरबा। “शिवाय हॉस्पिटल” का मामला अब एक सामान्य स्वास्थ्य संस्थान के शुभारंभ से कहीं आगे निकल चुका है। यह मामला अब सीधे-सीधे प्रशासनिक जवाबदेही, राजनीतिक प्रभाव और स्वास्थ्य व्यवस्था की विश्वसनीयता पर सवाल खड़ा कर रहा है।

शुरुआत ही विरोधाभास से होती है। एक तरफ प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री श्याम बिहारी जायसवाल ने इस अस्पताल के शुभारंभ कार्यक्रम से दूरी बना ली—जो अपने आप में संकेत था कि मामला सामान्य नहीं है—तो दूसरी तरफ उसी सरकार के वरिष्ठ मंत्री लखनलाल देवांगन उद्घाटन मंच पर पहुंचकर फीता काटते नजर आए।

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यहीं से संदेह की रेखा और गहरी हो जाती है। क्या यह केवल औपचारिक उपस्थिति थी या फिर इससे कहीं ज्यादा ? क्या यह संदेश देने की कोशिश थी कि अस्पताल को किसी स्तर का संरक्षण प्राप्त है ?

17 दिन से संचालन… लेकिन प्रशासनिक चुप्पी

इस पूरे मामले का सबसे गंभीर पहलू यह है कि जिस अस्पताल को लेकर लाइसेंस की प्रक्रिया अधूरी बताई जा रही है, वह पिछले 17 दिनों से संचालित होने की चर्चा में है

इन 17 दिनों में न कोई स्पष्ट कार्रवाई सामने आई, न कोई सार्वजनिक चेतावनी और न ही संचालन रोकने का आदेश। यही चुप्पी अब सबसे बड़ा सवाल बन चुकी है।

क्या विभाग को जानकारी नहीं है ? या फिर जानकारी होने के बावजूद कार्रवाई नहीं की जा रही ?

टाइमलाइन खुद बता रही कहानी

2 मार्च को लाइसेंस के लिए आवेदन, 5 मार्च से मरीजों का उपचार और 7 मार्च को भव्य शुभारंभ—यह घटनाक्रम अपने आप में असामान्य है।

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सामान्य प्रक्रिया में पहले अनुमति और निरीक्षण होते हैं, उसके बाद ही संचालन शुरू किया जाता है। यहां स्थिति इसके उलट दिखाई देती है।

नियम क्या कहते हैं

स्वास्थ्य विभाग के प्रावधानों के अनुसार किसी भी निजी अस्पताल को शुरू करने से पहले निर्धारित समय सीमा में आवेदन देना होता है। इसके बाद विभागीय टीम द्वारा निरीक्षण किया जाता है जिसमें भवन, उपकरण, स्टाफ, आपातकालीन सुविधा और सुरक्षा मानकों की जांच शामिल होती है। इसके अलावा फायर सेफ्टी और बायो मेडिकल वेस्ट मैनेजमेंट की अनुमति लेना भी अनिवार्य होता है। इन सभी प्रक्रियाओं के पूरा होने और जिला स्वास्थ्य समिति की मंजूरी के बाद ही लाइसेंस जारी किया जाता है और उसके बाद ही अस्पताल संचालन की अनुमति मिलती है।

लेकिन “शिवाय हॉस्पिटल” के मामले में इन प्रक्रियाओं के पूर्ण होने से पहले ही उपचार शुरू होने की बात सामने आ रही है।

सीएमएचओ की भूमिका पर सवाल

इस पूरे प्रकरण में जिला मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. सूर्यनारायण केसरी की भूमिका भी चर्चा में है। क्योंकि इस प्रकार के मामलों में कार्रवाई की जिम्मेदारी उनके ही विभाग पर होती है।

लेकिन अब तक न तो कोई सख्त कदम दिखाई देता है और न ही कोई स्पष्ट जवाब सामने आया है। इससे यह सवाल उठ रहा है कि क्या विभाग इंतजार कर रहा है या फिर किसी कारणवश कार्रवाई नहीं हो रही।

अनुमतियां लंबित होने की चर्चा

सूत्रों के अनुसार अस्पताल से जुड़ी कुछ महत्वपूर्ण अनुमतियां अभी लंबित हैं, जिनमें फायर सेफ्टी और बायो मेडिकल वेस्ट मैनेजमेंट शामिल हैं।

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यदि यह स्थिति सही है, तो यह केवल प्रशासनिक प्रक्रिया का विषय नहीं बल्कि मरीजों की सुरक्षा से जुड़ा गंभीर मुद्दा बन जाता है।

“अंदरखाने सेटिंग” की चर्चा

मामले में यह चर्चा भी सामने आ रही है कि प्रक्रिया को आसान बनाने के लिए अंदरखाने कुछ तय हुआ है। हालांकि इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं है, लेकिन घटनाक्रम ने इस तरह की चर्चाओं को और तेज कर दिया है।

डायरेक्टर पर पहले भी उठ चुके सवाल

अस्पताल के डायरेक्टर डॉ. दैविक हरिश्चंद्र मित्तल को लेकर पहले भी सवाल उठते रहे हैं। ऐसे में बिना लाइसेंस संचालन की चर्चा सामने आने से मामला और संवेदनशील हो गया है।

डॉ. दैविक हरिश्चंद्र मित्तल, संचालक

अब प्रशासन क्या करेगा ?

अब पूरा मामला एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा है। सवाल यह है कि क्या इस मामले में निष्पक्ष कार्रवाई होगी ? क्या यह स्पष्ट किया जाएगा कि लाइसेंस क्यों लंबित है और इसके बावजूद संचालन कैसे शुरू हुआ ?

“शिवाय हॉस्पिटल” का मामला अब एक अस्पताल का नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की पारदर्शिता और जवाबदेही की परीक्षा बन चुका है।

अब देखना यह है कि कानून अपनी राह लेता है या फिर यह मामला भी सवालों के बीच धीरे-धीरे दब जाता है।

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