KORBA BLAST कथा के मंच पर कब्जे की कोशिश ? बसंत अग्रवाल की एंट्री से भड़का बवाल , आयोजकों से सीधा टकराव

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कोरबा | विशेष रिपोर्ट

कोरबा में आयोजित हनुमंत कथा , जो श्रद्धा और भक्ति का केंद्र मानी जा रही थी , अब अंदरखाने विवाद और वर्चस्व की लड़ाई का अखाड़ा बनती नजर आ रही है । कथा के अंतिम चरण में जिस तरह से बसंत अग्रवाल की सक्रियता बढ़ी है , उसने पूरे आयोजन की दिशा और नियंत्रण को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं । बीती रात आयोजक ने अमरजीत सिंह ने बंसत और उसके समर्थकों को जमकर सबक सिखाया। 

बताया जा रहा है कि शुरुआत से आयोजन में लगे प्रमुख लोग अब खुद को हाशिये पर महसूस कर रहे हैं , जबकि बसंत अग्रवाल का प्रभाव अचानक बढ़ता दिखाई दे रहा है । प्रचार-प्रसार से लेकर अंदरूनी व्यवस्थाओं तक , कई स्तरों पर उनके दखल को लेकर असंतोष खुलकर सामने आने लगा है ।

VIP एंट्री पर टकराव , माहौल गरमाया

रविवार रात कटघोरा स्थित अग्रसेन भवन में स्थिति उस वक्त बिगड़ गई जब कार्यक्रम संयोजक अमरजीत सिंह अपने कुछ समर्थकों के साथ भीतर प्रवेश करना चाह रहे थे । इसी दौरान बसंत अग्रवाल से जुड़े लोगों ने उन्हें रोक दिया ।

यह रोक-टोक जल्द ही बहस में बदली और फिर मामला धक्का-मुक्की तक पहुंच गया । कुछ ही देर में दोनों पक्ष आमने-सामने आ गए और परिसर में तनाव की स्थिति बन गई ।

भू-माफिया के नाम से विख्यात है बंसत अग्रवाल

अपने को समाजसेवी बताने वाले बंसत अग्रवाल रायपुर और आसपास के इलाके में भू-माफिया के नाम से विख्यात है। खुद की राजनीतिक पहुंच बता कइयों ज़मीन पर कब्जा के आरोप बंसत पर लग चुके है। कोरबा में उसकी सक्रियता को लेकर अब सवाल खड़े हो रहे है। सूत्रों के मुताबिक उसके लोग पैसे लेकर कुछ लोगो को कथावाचक पंडित धीरेंद्र शास्त्री से मिलवा रहे थे जिसको लेकर अमरजीत के समर्थकों से कहासुनी हुई।

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आयोजकों को साइडलाइन करने के आरोप

आयोजन से जुड़े सूत्रों के अनुसार , पूरे कार्यक्रम में मेहनत करने वाली टीम को धीरे-धीरे किनारे किया जा रहा है । सवाल उठ रहा है कि आखिर किस आधार पर एक व्यक्ति का प्रभाव इतना बढ़ गया कि मूल आयोजकों की भूमिका कमजोर पड़ती दिखाई दे रही है ।

यह भी चर्चा है कि अंदरूनी व्यवस्थाओं और लोगों की आवाजाही तक में बाहरी हस्तक्षेप बढ़ा है , जिससे आयोजन की पारदर्शिता पर सवाल उठने लगे हैं ।

VIP कल्चर या पहुंच का खेल ?

सबसे ज्यादा चर्चा इस बात को लेकर है कि क्या आयोजन में प्रवेश और मुलाकात को लेकर किसी तरह की प्राथमिकता तय की जा रही है । क्या कुछ लोगों को विशेष पहुंच दी जा रही है और बाकी को रोका जा रहा है ?

पोस्टर और प्रचार से शक्ति प्रदर्शन ?

कथा स्थल के आसपास लगे पोस्टर , बैनर और प्रचार सामग्री भी अब चर्चा का विषय बन गए हैं । बड़े नेताओं के साथ तस्वीरों वाले फ्लेक्स के जरिए प्रभाव दिखाने की कोशिश को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं ।

स्थानीय लोगों का कहना है कि धार्मिक आयोजन के बीच इस तरह का प्रचार कई तरह के संकेत देता है , जो आयोजकों की मूल भावना से अलग नजर आता है ।

अचानक सक्रियता , कई सवाल

सबसे बड़ा सवाल यही है कि जो व्यक्ति शुरुआत में नजर नहीं आ रहा था , वह अंतिम दौर में इतना प्रभावशाली कैसे हो गया ?

क्या इसके पीछे कोई आर्थिक सहयोग है , कोई नेटवर्क है या फिर कोई बड़ा समीकरण काम कर रहा है ?

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फिलहाल मामला शांत जरूर बताया जा रहा है , लेकिन जिस तरह से आयोजन के भीतर खींचतान और आरोप सामने आए हैं , उससे साफ है कि यह विवाद अभी थमा नहीं है । आने वाले दिनों में यह मुद्दा और तूल पकड़ सकता है , जिससे कथा जैसे धार्मिक आयोजन की गरिमा पर भी असर पड़ने की आशंका है ।

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