कांकेर/जगदलपुर छत्तीसगढ़ की विश्व प्रसिद्ध सांस्कृतिक धरोहर ‘बस्तर दशहरा’ के भव्य और निर्विघ्न आयोजन की शुरुआत हो चुकी है। परंपरा के अनुसार, बस्तर दशहरा की सबसे महत्वपूर्ण और पहली मुख्य रस्म’जोगी बिठाई’ पूरी कर ली गई है। इस रस्म में जोगी (व्रती) दौलत सिरहा सिरसार भवन के पास बनाए गए 4 फीट गहरे गड्ढे (कुंड) में 9 दिनों की कठिन तपस्या और व्रत पर बैठ गए हैं।
क्या है ‘जोगी बिठाई’ की परंपरा?
बस्तर दशहरा दुनिया का सबसे लंबा चलने वाला अनोखा उत्सव है, जो लगभग 75 दिनों तक चलता है। इस पूरे आयोजन के दौरान किसी भी प्रकार की अनहोनी या बाधा न आए और दशहरा का पर्व शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न हो, इसके लिए माता के दरबार में जोगी बैठाए जाते हैं।
जोगी दौलत अगले 9 दिनों तक इसी 4 फीट गहरे कुंड में बैठकर अन्न-जल त्यागकर कठोर साधना और व्रत करेंगे। इस दौरान वे पूरी तरह से भक्तिभाव में लीन रहकर दशहरा के निर्विघ्न संपन्न होने की कामना करते हैं।
विधान और परंपरा का पालन
रस्म के तहत विधि-विधान और पूजा-पाठ के बाद जोगी को निर्धारित कुंड में बैठाया गया। इस दौरान स्थानीय मांझी, चालकी, पसी और पुजारी समेत बड़ी संख्या में परिचारक और ग्रामीण मौजूद रहे। बस्तर की संस्कृति में इस रस्म का बहुत बड़ा आध्यात्मिक और धार्मिक महत्व माना जाता है।
जोगी के कुंड में बैठने के साथ ही बस्तर दशहरा के आगामी आयोजनों और रस्मों का सिलसिला तेजी से आगे बढ़ेगा, जिसमें दूर-दूर से आने वाले सैलानियों और स्थानीय आदिवासियों में भारी उत्साह देखने को मिल रहा है।
